सपना

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आज कॉलेज का आख़िरी दिन है आज के बाद लगभग सभी लोग अलग हो जाएंगे पता नही फिर कब मिलना हो इसलिए सभी इस आखिरी दिन को यादगार बनाने की कोशिश में लगे हुए है। हालाकि मेरी पढाई में कोई रूचि नही थी इसलिए  मैं बीए कर रही थी मुझे तो बस शादी से बचना था इसलिए पढाई का बहाना सबसे अच्छा है पढाई के नाम पर तीन साल के लिए शादी से छुट्टी मिल गयी। कॉलेज ख़त्म होने से पहले ही पापा और जीजाजी ने मेरे लिए लड़का पसंद कर के रखा है जैसे ही कॉलेज खत्म मेरी शादी होने वाली है।शादी को लेकर हर किसी के सपने होंते है सभी की तरह मैंने भी कुछ सपने सजा रखे है। मेरे सपनो का राजकुमार कैसा होना चाहिए मैंने पूरी लिस्ट बना रखी है। वो मुझसे लंबा होना चाहिए मेरे से ज्यादा पढ़ा लिखा और दिखने में भी अच्छा होना चाहिए और सबसे जरुरी चीज व्यक्त्वि और सौभाव का अच्छा होना चाहिए। शराब और किसी भी तरह का नशा नही करने वाला होना चाहिए ये चीज सबसे ज्यादा जरुरी हैं क्योंकि मैंने नशे से कितने ही घरों को बर्बाद होते हुए देखा है। नशा समाज को खोखला कर देता है किसी दीमक की तरह

कॉलेज खत्म होने के बाद जब मै घर पहुँची तो मेरी मां बाहर के दरवाजे पे खड़ी थी मानों वो मेरा इन्तजार कर रही हो। मुझे देखते ही मेरी माँ के चेहरे पे एक प्यारी सी मुस्कान आ जाती इस मुस्कान से मेरी माँ और भी सुन्दर लगने लगती है। माँ ने मेरे लिए खाना निकाला और मै हाथ मुँह धो कर खाना खाने को बैठी आज मेरे पसंद की सब्जी बनी थी इसलिए मै जल्दी से शूरु हो गयी, माँ ने कॉलेज के बारे में पूछा और कहा कल तुझे देखने आ रहे है मेरा मुँह में निवाला जाते जाते रुक गया ये सुनते ही की कल मुझे देखने आ रहे हैं। मैंने माँ से कहा इतनी जल्दी क्या है माँ ने कहा ये मेरा फैसला नही तेरे पिताजी का है जो कहना है उन्ही से कहना मुझे बताने को कहा मैंने बता दिया कल कही जाना नही कल 10 बजे ही वो लोग आ जायेंगे फिर 2 से 3 बजे तक निकल जाएंगे। तेरे पिताजी बोल रहे थी की लड़का रेलवे में इंजीनियर है। इससे अच्छा रिश्ता कहाँ मिलेगा। अगर बात बन गयी तो तेरे तो किस्मत ही खुल जाने है। राज करेगी मेरी बेटी सबसे अच्छी बात ये है कि तेरी सास नही है और वो इकलौता लड़का है एक लड़की भी है उनकी उसकी भी शादी हो चुकी है।


बज चुके है घड़ी में मेरे दिल की धड़कन तेज हो रही है मुझे बहुत घबड़ाहट हो रही है पता नही लड़का कैसा होगा यही सोच सोच के मेरा दिमाग खराब हो रहा है मैं अभी तक तैयार भी नही हुई इस पर माँ मेरे पर चिल्ला रही है । मुझे उनके सामने जाना होगा मुझे बहुत डर लग रहा है पता नही क्या होगा मेरा कही कुछ मेरे से गलत हो गया तो पिताजी मुझे जान से मर देगे। जैसे तैसे मै तैयार हो गयी और उनके आने का इंतजार कर रही थी तभी माँ आयी और बोली ये क्या हाल बना रखा है ऐसे जायेगी उनके सामने । मैंने माँ से कहा क्या हुआ अब मै तो तैयार होकर बैठी हुई हूँ इसपर माँ ने कहा ये कपड़े नही चलेगे साड़ी पहन लो मैंने इन्कार कर दिया माँ ने जबदस्ती मुझे साड़ी पहना दी। साड़ी मै थोड़ी लंबी लग रही थी और पहले से ज्यादा सुन्दर भी दिख रही थी।इतने में पिताजी की आवाज आई की मेहमान आ गए चाय पानी ले आओ। ये सुनते ही मेरा दिल और भी जोरो से धड़कने लगा।


लड़के वाले बैठे थे माँ और पिताजी उनसे बाते कर रहे थे इतने में माँ उठी और मेरे कमरे की ओर आने लगी मै समझ गयी की मेरा बुलावा आया है। मै माँ के साथ उनके सामने गयी मै सबको प्रणाम किया और फिर माँ ने मुझे लड़के के सामने वाली कुर्सी पर बिठा दिया। मै अंदर से बहुत घबराई हुई थी फिर भी जैसे तैसे अपने आप को संभाला और शांति से बैठी रही । मैंने धीरे से नजरे बचाते हुए लड़के को ठीक से देखा लड़का वैसा ही था जैसा मैंने सोच रखा था मैं मन ही मन बहुत खुश हुई और हल्की सी मुस्कुराई। उनके चेहरे देख के ये लग रहा थी की मै उन्हें पसंद आ गयी । उनके पूरे बातचीत के दौरान शांति से बैठी रही उन्होंने जो पूछा बस उसका ही जबाब दिया बस फिर खामोश बैठी रही। वो लोग रिश्ता पक्का कर के चले गए वो मुझे रिश्ते की पहली भेट भी दे गए जिसमे एक सेट साड़ी थी एक चाँदी की आगूठी और चांदी की चैन और कुछ फल थे। मै खुश थी क्योंकि लड़का मेरे पसंद का था। मैंने आगूठी और चैन को पहन लिया। शाम को उनलोगों का फ़ोन आया की 15 दिनों के बाद की शादी का मुहर्त निकाला है पिताजी ने भी हाँ कह दिया। मेरे पिताजी मेरी शादी तय होने से बहुत खुश थे ।


शादी का दिन कब आ गया मुझे खुद ही पता नही चला मै भी पूरी तरह से तैयार बैठी थी मेरी सहेलिया मेरी चुटकी ले रही थी और हँसी मजाक चल रहा था मैं भी बहुत खुश थी तभी किसी ने आवाज दी की बारात आ गयी हम सब बारात देखने के लिए बालकनी में आ गए दूल्हा घोड़े पे आया था उसने शेरवानी पहना हुआ था वो बहुत अच्छा लग रहा था। निश्चित मुहर्त पे हमारी शादी हो गयी मै बिदा होकर अपने ससुराल को जाने वाली थी सभी लोग रो रहे थे साथ में मैं भी रो रही थी मेरे तो आँशु रुक ही नही रहे थे।सब से बिदा ले के मैं चली गयी।


ससुराल पहुँची तो तो पता चला की मेरा नया घर बहुत बड़ा था और काफी आलीशान भी लग रहा था कुछ औरतो ने मेरी आरती उतारी और सारी रस्मे की फिर मुझे अन्दर ले जाया गया घर अंदर से भी काफी सुन्दर था। रात हो गयी छोटे मोटे रस्मे निभाने में ही मै बहुत थक भी गयी थी । आज हमारी सुहागरात थी हमारे कमरे को सजा दिया गया था। जैसे फिल्मो में दिखाया जाता है, मै थोड़ी सी घबराई हुई थी और अपने पति का इंतजार कर रही थी। इंतजार करते करते काफी समय हो चला और मुझे नींद भी आ रही थी मै जमाही ले रही थी तभी वो अंदर आये वो ऐसे चल रहे हो जैसे कोई शराबी शराब पी के चलता है। वो मेरे पास आ के बैठे, उन्होंने जैसे ही बात करने के लिए अपना मुँह खोला उनके मुंह से शराब की गन्दी बदबू का एहसास होता है । उन्होंने मुझसे पूछा तुम ठीक तो हो खाना वाना खाया की नही,मैंने हाँ में सिर हिलाया वो फिर बोले मुझे माफ़ करना मै शराब नही पीता आज मुझे मेरे दोस्तों ने जबर्दस्ती शराब पिला दिया । 
मैंने उनसे कहा कोई बात नही पर मुझे शराब पीने वाले लोग मुझे पसंद नही है । इसपर उन्होंने मुझसे वादा किया किया कि आगे से कभी शराब नही पिऊँगा। उन्होंने बहुत ज्यादा पी रखी थे उनसे बैठा भी नही जाता मैंने ही उनसे कहा आप सो जाइये आप से ठीक से बैठा भी नही जा रहा और मुझे भी बहुत नींद आ रही है। वो कुछ बोलते बोलते सो गए मैंने उन्हें ठीक किया और मैं भी साथ में ही सो गयी।


सुबह जब आँख खुली तो मैं जल्दी से तैयार होकर सब के लिए नास्ता बनाने को चली गयी। थोड़ी देर के बाद उनकी नींद खुली और उन्होंने मुझे आवाज लगाई उनके सिर में बहुत दर्द हो रहा था इसलिए उन्होंने नीम्बू पानी लाने को कहा साथ में सर दर्द की दवाई भी मै तुरंत ही उन्हें दोनों चीजे ला के दे देती हूँ।वो दवा खा के तैयार होने को चले जाते है। उनको मैंने नाश्ता करके काम पे भेज दिया। क्योंकि मेरी सास नही थी और आज सारे रिश्तेदार भी चले जायेंगे इसलिए मैंने जल्दी से घर को सँभालने की सोची।


ऐसे ही कुछ दिन बीत गए शुरु में सब सही चल रहा था पर अचानक उन्होंने अपना रंग बदला और फिर रोज शराब पी के घर आने लगे ,इस बात को ले कर हम दिनों में रोज कहा सुनी होने लगी । मै उन्हें रोज मना करती की शराब ना पिये और वो फिर भी रोज पी के आते फिर रोज रात को हमारी लड़ाई होती। एक दिन हमारी लड़ाई हो गयी उन्होंने मुझ पे हाथ उठा दिया, मुझे एक झटका सा की आज उन्होंने मुझ पे हाथ उठा दिया यही सोच सोच के मै  पकड़ के रोते जा रही थी और वो दूसरे कमरे में जा के सो गए। मै रात भर रोते रोते बिता दी ।


फिर ये रोज की बात हो गयी वो पी के आते और रोज मुझे मारते पीटते । मैंने ये बात अपने माँ बाप को बताई और वो आये और उन्हें समझा के चले गए। फिर कुछ दिनों के बाद वही सब फिर से चालू हो गया अब तो वो कुछ और ही ज्यादा हिंसक हो गए थे। मेरा जीवन नरक बन गया था, मै बहुत परेशान और दुखी हो चुकी थी अपने जीवन से कभी कभी तो दिल करता की जान दे दूँ ऐसी जिंदगी से तो मर जाना ही बेहतर है। एक दिन तो बात इतनी ज्यादा बढ़ गयी की उसने मेरा सिर दिवार पे पटक दिया जिससे मेरा सिर फट गया और खून बहने लगा और मेरा पूरा चेहरा खून से लाल हो गया चोट इतनी जोर से लगी की मुझे चक्कर आ गया और मै बेहोश हो के गिर गयी। रात भर मै ऐसे ही पड़ी रही जब आँखे खुली तो चोट के कारण सिर में बहुत दर्द हो रहा था और जमीन पे बहुत सा खून फैला हुआ था । मैं जैसे तैसे करके उठी और बैठी फिर मैंने अपने माँ को फ़ोन किया और सब बात बता दी।


मेरी माँ आयी और मुझे अपने साथ ले गयी और मै फिर कभी उस घर में नही गयी अब मैंने भी नौकरी पकड़ ली है । अब मै एक स्कूल में पढ़ाती हूँ । लेकिन दुःख इस बात का है कि मेरा सपना टूट गया और ऐसे टुटा की मेरा सुहाना सपना एक दर्दनाक और खौफनाक सपने में बदल गया।

​ एक प्रेम कहानी

                एक प्रेम कहानी


मै अपने ऑफिस के केबिन में  एक ग्राहक से फ़ोन पर बात कर रहा था तभी मेरे केबिन का दरवाजा खुला और सामने मेरी सह-कर्मी कोमल थी  अपनी प्यारी सी मुस्कान के साथ वो धीरे से अंदर आने को पूछती है और मैंने भी हाथ के इशारे से अन्दर आने का इशारा किया और वो अंदर आ के मेरे सामने खड़ी हो गयी मैंने उसे बैठने का इशारा किया और मै अपनी बात खत्म करके कोमल से पूछता हूँ बताई ये ग़रीब आज आप की क्या सेवा कर सकता है मैंने माजकिये अंदाज में कहा। वैसे उसे देख के लोगो के होश उड़ जाते है क्योंकि वो है ही इतनी सुन्दर और प्यारी। अगर कोई उसकी आवाज़ सुन ले तो दीवाना सा हो जाये उसकी आवाज में एक जादू सा था। लेकिन मुझे उसकी मुस्कान बहुत पसंद हैं।


वो इससे पहले कुछ बोलती मैंने फ़ोन उठा के दो कॉफ़ी लाने को बोल दिया इसपर वो मुस्कुरा के बोली मै यहाँ कॉफी पीने नही आयी मुझे तुम से कुछ कहना है मैंने कहा हाँ हाँ बोल देना जो कहने आयी कॉफी पीते-पीते, अब आयी हो पी के ही जाना। वैसे कोमल प्रबंधन में काम करती है और मै मार्केटिंग में। फिर मैंने उससे पूछा बोलो क्या कहने आयी हो मैंने थोड़ा माजकिये अंदाज में फिर से कहा।


वो थोड़ा घबड़ा रही थी उसकी चेहरे से  साफ साफ पता चल रहा था। मैंने घबराते हुए उससे पूछा सब ठीक तो है ना कोई परेशानी तो नही है पर वो फिर भी कुछ नही बोली और अपना सर नीचे कर के अपने दाहिने हाथ की अंगूठी को बार बार निकाल रही थी फिर से पहन रही थी। मैं ये सब देख रहा था और थोड़ा हैरान भी जहाँ तक मैं कोमल को जानता हूँ वो घबराने वाली लड़कियों में से नही थी। वैसे मैं उसे पिछले दो सालों से जानता हूँ और वो मेरी काफी अच्छी दोस्त भी हैं वो मुझसे सभी बाते बताती हैं वो मुझसे कभी कुछ नही छिपाती चाहे कैसी भी परेशानी हो वो सबसे पहले मुझे ही बताती थी। मैंने कोमल को फिर से पूछा बताओ क्या बात है फिर उसने अपना सर ऊपर किया और वही प्यारी सी मुस्कान दी जिसका मैं दीवना हूँ उसकी मुस्कान देख के चाहे मेरा मूड कैसा भी वो सही हो जाता हैं इतनी प्यारी मुस्कान है उसकी,उसकी मुस्कान में एक भोलापन है।
उसकी मुस्कान से मुझे पता चल गया कि कोई चिंता की बात नही हैं पर वो कुछ बोल क्यों नही यही मेरी समझ में नही आता वैसे तो वो बहुत बोलती है पता नही आज क्यों मौन व्रत धारण किये हुई हैं जिससे मेरी जानने की जिज्ञासा और ज्यादा बढ़ गयी है। मैं भी उसे बार बार बोले जा रहा हूँ बोलने को इतने में कॉफ़ी आ गयी मैंने उसे कॉफी पीने को कहा और हम दोनों कॉफ़ी पिने लगे ,मैंने फिर कोशिश की और कहा अब तो बता दो क्या बात है जिसके लिए इतना इंतजार करा रही हो। लेकिन फिर भी वो चुपचाप कॉफी पिए जा रही थी और कप को टेबल पर रख के एक गहरी सांस लेती है और अचानक एक झटके में बोल पड़ती हैं “I Love You”। और फिर वो चुप हो जाती है अब उसकी आँखों में एक सकून दिख रहा था पर उसका गला सुख रहा था मैंने पानी का गिलास उसकी तरफ कर के बोल पी लो पानी थोड़ा आराम लगेगा। जब उसने ई लव यू कहा तो मुझे एक झटका सा लगा की ये आखिर कब और कैसे हुआ मैं भी यही सोच रहा था।
मैंने उसे समझाने वाले अंदाज में बोला कोमल ये सब क्या हैं तुम ने तो आज मुझे झटका दे दिया आज अच्छा किया कि अपने दिल की बात बता दी अब तुम्हे कैसा लग रहा है वो फटाक से बोल पड़ी अब दिल दिमाग सब हल्का लग रहा है बहुत बोझ सा लग रहा था । तुमने अपने दिल की बात बता दी मुझे इस बात की बहुत ख़ुशी है और मुझसे कही ये उससे भी ख़ुशी की बात हैं ये सुन के उसे बहुत संतोष महसूस हुआ। तुम बहुत अच्छी और प्यारी हो “लेकिन” सुनते ही उसके आखो में एक चमक और थोड़ा डर भी दिखने लगा वो बहुत ही ज्यादा उत्सुख हो रही थी। लेकिन तुम्हे एक बात मेरे बारे में शायद पता नही मै किसी और से प्यार करता हूँ, ये सुनते ही वो उदास हो गयी उसकी आँखों में थोड़ा सा पानी भी आ गया था पर वो उसे छुपाने के बोल पड़ी अब मै चलती हूँ मुझे बॉस बुला रहे है शायद और वो वहाँ से बहाना बना के चली गयी और बहार जा के अपने आंसुओ को पूछते हुए अपने केबिन की ओर चली गयी।


कुछ ही देर तक मै सोचता रहा इतने मेरी नजर घड़ी पर गयी लंच का समय हो गया था मैंने सोचा आज लंच नही करूँगा फिर दिल में क्या आया मैंने अपना डब्बा उठाया और कैंटीन की और चल पड़ा। रास्ते में मुझे रोहन मिला और हम दोनों में कैंटीन की ओर चल पड़े।कैंटीन पहुँच के मेरी आँखें कोमल को ही खोज रही थी मैंने देखा की आज वो कोने में जा के कोल्ड ड्रिंक पी रही थी और गहरी सोच में पड़ी हुई थी। उसके टेबल के पास जा के उससे पूछ्ता हूँ क्या मैं यहाँ तुम्हे जॉइन कर सकता हूँ पर ऐसा लगा हो उसने मेरी बात ही नही सुनी फिर मैंने उससे पूछा मै तुम्हे ज्वाइन कर सकता हूँ ये सुन के वो सकपका गयी और वो बोली तुम ऐसा लग रहा था जैसे मैंने उसे नींद से जगा दिया हो।मैंने उससे पूछा कहाँ खोयी थी वो बोली कही नही मै तो यही हूँ।फ़िर मैंने उससे कहा आज कुछ खा नही रही हो। वो थोड़ा दुखी हो के बोली आज खाना खाने का मूड नही है इसपर मैं भी बोल पड़ा आज मेरा भी मूड नही है पर बेचारे इस डिब्बे का क्या दोष है बताओ आज ऐसे ही पड़ा रहेगा और खाना बेकार हो जायेगा। मैंने कहा कोमल आज ऐसा करते है तुम्हारा भी मूड नही और मेरा भी मूड नही क्यों ना आज इस डिब्बे को दोनों बिना मूड के खा लेते है ये बोलते हुए मैंने डिब्बा खोल के मैंने कोमल की ओर बढ़ा दिया पर उसने मना कर दिया फिर मैंने उससे कहा प्लीज मेरे लिए थोड़ा सा तब जब के वो खाना खाने को तैयार हो गयी।


हमने खाना खाना शुरू कर दिया खाते हुए मैंने उससे कहा i am sorry कोमल मुझे ये बात तुम्हे पहले ही बता देना चाहिए था। कम से कम तुम्हारे दिल को आज तकलीफ़ ना होती,उसने कहा कोई बात नही मुझे ये बात पहले पूछ लेनी चाहिए थी वैसे कौन है वो खुशनशीब लड़की जिसको तुमने अपना दिल दिया है कौन है मेरी सौतन उसने माजकिये अंदाज में कहा। “नेहा” नाम है उसका वो बोल पड़ी चलो आज तुम्हारी Love story सुनते है चलो बताओ शुरू से, शुरू हो जाओ फिर मैंने उसे बताना शुरु किया अपनी कहानी मेरी उससे पहली मुलाकात उस समय हुई जब मैं अपने ऑफिस से मीटिंग के लिए जा रहा था तभी लिफ्ट के पास एक लड़की ने मेरे कम्पनी का रास्ता पूछा और मैंने उसे एक मंजिल और ऊपर भेज दिया।कुछ दिनो के बाद पता चला की वो उसी कम्पनी में जॉब के लिए आई हुई थी मैं उसे देखकर थोड़ा डर गया ।


फिर मैंने उसके बारे में पता किया और उसके पास गया और उससे कहा sorry जी मै थोड़ा उस दिन आप से मजाक कर रहा था फिर हम दोनों में बातचीत शुरू हो गयी। हम रोज साथ में खाना खाते ।कुछ दिनों के बाद हम साथ में आने जाने लगे ,धीरे धीरे हम दोनों में बहुत अच्छी दोस्ती भी हो चुकी थी और ये दोस्ती कब प्यार में बदल गया हमे पता भी नही चला । मैंने एक दिन हिम्मत करके उससे पूछ ही लिया की वो मुझे प्यार करती है या नही ये कह के सारा मजा ख़राब कर दिया की आज यही बात वो भी मुझसे पूछने वाली थी ,पर मै बहुत खुश था । उसने घुमा कर ही हाँ बोल दिया था मैं खुशी के मारे उछल पड़ा मेरी ख़ुशी का कोई ठीकाना नही था क्योंकि ये मेरा पहला प्यार था। उसके बाद हम दोनों साथ में बहुत सारा वक़्त साथ में बिताते कभी फिल्म के लिए तो कभी बाहर खाना खाने के बहाने साथ में घूमते रहते।हमारा प्यार और भी गहरा होता चला । हम दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया ये बात हम अपने घर वालो को बताने की सोची की किसी दिन दोनों अपने घर वालो को अपने रिश्ते के बारे में बता देंगे।
अचानक उसने ऑफिस आना बंद कर दिया मुझे लगा उसने नौकरी छोड़ दी पर ऐसा ना था उसका नंबर भी बंद आ रहा था मुझे बहुत टेंशन हो रही थी की बात क्या है , शाम को मै उसके घर जाने की सोची फिर मैंने ये आईडिया छोड़ दिया सोचा आज नही अगर वो कल नही आयी तो पक्का कल उसके घर चला जाऊँगा। अगले दिन वो फिर नही आयी मुझे और ज्यादा टेंशन हो गयी आज का दिन ही नही कट रहा था ऑफिस में ऐसा लग रहा था अभी छुट्टी हो और उड़ के उसके घर चला जाऊ। शाम को छुट्टी होते ही बिना रुके मै सीधा उसके घर को चला गया उसके घर पहुँच कर देखा तो घर में ताला लगा था पड़ोसी से पता किया तो पता चला की वो शहर छोड़ के चले गए। मेरा दिल एक झटके में टूट कर बिखर गया मेरे पैरों तले से जमीन ही मानो खिसक गयी हो मुझे बिलकुल भी होश ना रहा मैं पागलो की तरह सड़को पर चले जा रहा था । मैं चलते समय यही सोच रहा था कि मुझे बिना बताये वो चली गयी ना ही कोई फ़ोन ना ही कोई मैसेज ऐसा कैसे हो सकता है इतने में मै किसी चीज से टकरा गया जब आँखें खुली तो पता चला मै हॉस्पिटल में हूँ और मेरा एक्सीडेंट हो गया हैं मुझे ज्यादा शरीर पर तो चोट नही आयी थी पर जो चोट दिल पे लगी थी उसका दर्द नही सहा जा रहा था। मैं पागल हो होने लगा हर पल उसकी याद आती है मेरा प्यार मुझसे जुदा हो गया मेरे सारे अरमान टूट गए सपने बिखर गए थे ।


मुझे किसी बात का होश तक नही रहा 6 महीने तक मैं पागलखाने में रहा उसके बाद कुछ ठीक हुआ तो घर वालो ने घर लाया लेकिन उसकी याद आज भी आती है और आज भी मैं उसे उतना ही प्यार करता हूँ। अभी कुछ दिनों पहले ही उसकी एक रिश्तेदार मिले तो पता चला की उसकी शादी हो चुकी है। जब वो शहर छोड़ के गयी उसके 2 महीने बाद ही ये जान कर मुझे और भी ज्यादा दुखी हो गया। 

लेकिन ये बाद सुनते ही कोमल बहुत खुश हो रही थी क्योंकि उसका रास्ता साफ दिख रहा था उसने ख़ुशी के मारे मुझे गले से लगा लिया और बोलने लगी i love you लेकिन तुम्हारे पहले प्यार के लिए मुझे बहुत दुःख है। मुझे ये नही समझ में आ रहा था कि कोमल खुश है या दुःखी क्योंकि मैंने उसे अभी तक हाँ नही कहा था पर उसकी खुशी देख के मै अपने सारे गमो को भूल बैठा।
मुझे इस बात की ख़ुशी थी की आज मेरी वजह से किसी को ख़ुशी मिली थी।

एक कहानी बेबशी

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दिन भर खेतो में काम करके शरीर टूट जाता हैं ऐसा लगता है मानो शरीर को किसी ने गीले कपड़ो की तरह निचोड़ दिया हो। एक तो ये खेती का काम ऊपर से गरीबी का हाल क्या बताऊँ जितनी भी मेहनत कर लूँ खून पसीना बहा ले दो वक़्त की रोटी भी ठीक से नही मिल पाती। गरीबी में इन बच्चों को कैसे पाले कुछ समझ में नही आता हैं । घरवाली बोलती रहती है सारा दिन शहर जा के कोनों काम करो इ खेती से बीबी बच्चो का पेट नही पलने वालाअब करे तो का करे इस गरीबी ने तो जीना ही दुभर कर रखा है।

लाला से कर्जा ले के पैसा खेती में तो लगा दिए है पर बहुत मुश्किल लग रहा है इस बार कर्जा चुकाना। पिछले साल का पैसा भी थोड़ा बाकि है ऊपर से इतना सारा ब्याज़ ऐसा लगता है मानो किसी ने सिर के ऊपर बहुत बड़ा चट्टान ला के जबर्दस्ती रख दिया हो। लाला के पैसे से ही तो पिछले पाँच सालो से घर चल रहा हैं, लाला भी तो ठीक आदमी नही है जब भी ब्याज़ देने में देरी होती है तो अपने पहलवानों को ले आ धमकाता हैं, फिर उसे घर में रखा जो भी सामान मिलता है उठा के ले जाता है और मै मूक दर्शक की तरह ये तमाशा देखते रहता हूँ, पहली बार जब लाला आया था तो मैंने उसे रोकने की हिम्मत भी की थी लेकिन लाला भी बहुत जालिम और ज़लील इंसान हैं उसे बस अपने पैसे से मतलब हैं चाहे वो कैसे भी आये उससे उसे कोई भी फर्क नही पड़ता हैं। 

अब जब भी लाला आता है तो मुझे पहले दिन की बात याद आ जाती है जब उसने अपने पहलवानों से मुझे पिटवा दिया पैसे भी ले गया और घर का थोड़ा सामान भी गया। मै लाला के आगे हाथ जोड़े कुछ समय की मौहलत मांग रहा था तो उसने अपने सबसे तगड़े पहलवान को इशारे से कहाँ की मुझे पिट दे उसने भी इशारा पाते ही मुझ पर ऐसे टूट पड़ा मानों की मै कोई बकरी का बच्चा हूँ और वो शेर। वो मुझ पर हमला करने को जैसे ही आगे बढ़ा मैंने उसे देख लिया और मै लाला से दूर हो गया। कलुवा नाम था उस पहलवान का शरीर से भी पूरा कोयले जैसा ही रंग था उसका। दस गाँव में उसके जैसा कोई भी पहलवान ना था। सब डरते थे उससे , उसे मेरी ओर आते देख मेरे तो प्राण ही सूख गए मुझे मेरी मौत मेरे सामने से आते दिख रहा था। मैंने एक बार देखा था कलुवा को किसी को पीटते हुए बड़ी बेरहमी से मरता है पूरा का पूरा जल्लाद है ।

इतना ताक़तवर हैं फिर भी ना जाने क्यों इस कमीने लाला के लिए काम करता हैं। कलुवा जब चाहे लाला का काम तमाम करके उसकी सारी दौलत और ज़मीन पर कब्ज़ा कर सकता हैं पर कुछ तो होगा ऐसा जिसके कारण उसे लाला के यहाँ काम करना पड़ता हैं उसकी भी कोई मज़बूरी रही होगी जिसका फ़ायदा लाला उठा रहा हैं। लाला तो अपने बाप का भी बाप हैं किसी पर रेहम नही करता।


मेरे कितने भी हाथ पैर जोड़ने पर भी लाला नही माना इतने में कलुवा ने मुझे आके पकड़ लिया और मुझे उठा के एक हाथ से फेक दिया ऐसा लग रहा हो कि कलुवा के लिए मैं कोई कपड़े का गठ्ठर हूँ।मैं जमींन पे जा गिरा और बोलने लगा मुझे छोड़ दो पर मेरी किसी ने नही सुनी । कलुवा लगातार बेरहमी से मुझे से पिटे जा रहा था। मेरा एक हाथ भी टूट गया इतनी पिटाई के बाद लाला को चैन आया और उसने कलुवा को रुकने को कहा तब जा कर वो शांत हुआ। लाला मेरे पास आके कह के चला गया कि आगे से समय पे पैसे नही दिया रो यही हाल करूँगा। ये बोल के लाला और इसके पहलवान चले गये। ये सब तमाशा पूरा गाँव जमा हो कर देख रहा था, मुझे इसका जरा भी ध्यान नही था। ये तो अच्छा था मेरी घरवाली अपने मायके गयी हुई थी नही तो वो ये सब बर्दास्त नही कर पाती और ना ही मेरे बच्चे।
बच्चे स्कूल जाने लायक है पर मैं इस लायक नही की उन्हें स्कूल भी भेज सकूँ । मै तो उन्हें ठीक से खाना भी नही खिला पाता। घर के नाम पे एक टूटी फूटी सी मेरी छोटी सी झोपड़ी ही हैं इसमें भी अगर बारिश का दिन हो तो मेरी झोंपड़ी छन्नी बन जाती है जिससे पानी छन के आता हैं। कभी कभी मन में आता है ऐसी जिंदगी से मर जाना ही बेहतर हैं लेकिन अपने बच्चों का मुंह देखकर हर बार रुक जाता हूँ चाहे जैसे भी हो इन्हें पालने की कोशिश कर रहा हूँ भले ही हर बार मै नाक़ाम हो जाता हूँ। दिल से एक आवाज आती है जो बहुत संतोष भरा होता हैं “रुक जा ऐ मुशफिर अभी तेरा वक़्त नही आया है एक दिन जब तेरा वक़्त आएगा जब तुझे कोई रोकने वाला ना होगा चाहे लाख लगा दो पहरे ये पंछी अपने आप उड़ जाएगा बस इंतजार कर उस वक़्त जब तेरा दिन भी बदल जाएगा।
गांव वालों भी सिर्फ मेरी बेबशी का तमाशा देखते हैं कोई आगे आकर हाथ भी ना तो देता है। एक वक़्त था जब मै भी सपने में खोया रहता था अपनी ही मस्ती में मस्त रहने वाला इंसान अब कोलू का बैल बन के रह गया हैं जो दिन रात बस पिसता रहता हैं।

 
जिंदगी के अब मायने ही बदल गए पहले जीता था और अब बस जिन्दा हूँ अपने आखिरी अंजाम के लिएगरीब की जिंदगी तो बस दो वक़्त की रोटी कमाने में चली जाती हैं फिर भी कई रातो को भूखे पेट ही सोना पड़ता हैं बड़ी लगती हैं ये जिंदगी जब मौत का इंतजार हो और वो आप के साथ आँख मिचौली खेल रहा हो। अभी आधी उम्र भी नही हुई और चेहरा लटक गया गया है चमड़ी अभी से ढ़ीली महसूस होती है चेहरे पे झुर्रियो ने अपना कब्जा जमा लिया है 35 कि उम्र में ही 50 साल का लगता हूँ ये होती है गरीबी और लाचारी का असर, जो गरीब के चेहरे से उसकी लाचारी छुपाये नही छुपती, मेरे चेहरे की झुर्रिया चीख चीख के मेरी बेबशी को बया कर रही हो।
इस बार जो लाला से पैसे उधार लिए उसी पैसे से धान की बुआई तो कर दी पहली बारिश मेंअब आगे तो ऊपर वाला ही मुझे बचा सकता हैं इस बार अगर फसल अच्छी हुई तो लाला का कर्जा चूका कर भी थोरे पैसे बच जाएंगे अगर कुछ गड़बड़ हुई तो मैं पूरा बर्बाद हो जाऊँगा। पहले से करजे में हूँ और लाला व्याज के नाम पे घर का आधे से ज्यादा समान ले जा चूका हैं। बस ये फसल अच्छी हो जाये 5 सालो से इसी आस में जी रहा हूँ लेकिन हर बार कुछ ना कुछ हो ही जाता हैं जिससे मेरे सपने टूट जाते हैं।
रोज खेत में पानी पटा के वही सो जाता हूँ ताकि कोई आके मेरे खेत को बर्बाद ना कर दे मेरे पास जो है बस यही तो है। यही मेरे भविष्य को तय करने वाला है इसलिए इतनी इफजात करनी पर रही है। बस अब दस दिनों में कटाई शुरू करुगा और इसे बेच कर सबसे पहले लाला का कर्जा चुकाऊंगा उसके बाद ही अपने लिए और अपने परिवार के लिए कुछ करूँगा। यही सोच रहा था कि अचानक मौसम बदलने लगा आसमान में एकाएक काले घने बदल छा गए माहौल ऐसा लग रहा था मानो दिन की दोपहरिया में ही रात हो गायी हो साथ में तेज हवा भी चलने लगी मेरा मन जोर से घबराने लगा अगर ऐसी खड़ी फसल पे बारिश हुई तो मैं तो बर्बाद हो जाऊँगा। थोड़ी देर तेज हवाएं चलने के बाद हवा शांत हो गयी मुझे लगा अब कुछ नही होगा 15 से 20 मिनट तक एक पत्ता तक नही हिला। फिर अचानक वही हुआ जिसका मुझे डर था जोरदार बारिश शुरू हो गयी उसी के साथ मेरे आँखों से भी पानी बहने लगा। मै खेतो के बीच में खड़ा रहा और अपने आप को  बर्बाद होते देख रहा था इतने में मेरी घर वाली आती हैं और मुझे घर चलने को कहती हैं मैंने उसे मना कर दिया पर वो बार मेरा हाथ पकड़ के अपनी ओर खींचने की कोशिश करती पर मैं वही खड़ा का खड़ा रहा मनो मै कोई पत्थर की मुरत बन गया हूँ। बार बार मेरी बीबी के प्रयास करने पर वो भी तंग आके ये कह के चली गयी की “मारो तुम भी यही फसलो के साथ फसल तो गया अब तू भी यही मर“। बारिश का ये आलम था कि वो रुकने का नाम ही नही ले रही थी ।
ये बारिश भी लगता है मन बना के आया है कि ये इस बार मुझे भी साथ ले कर जायेगा। पूरा दिन और पूरी रात के बाद सुबह 5 बजे के आसपास जा के बारिश बंद हुईं, बारिश बंद होने के बाद पता चला की मेरा पूरा खेत और साथ के सभी खेत भी पानी से लबालब  भरे हुए थे मेरे साथ सभी की फसल बर्बाद हो चुकी थी।
ये देख कर मेरा अंदर मानो कुछ बचा ही ना हो मुझे बार बार बस एक ही ख्याल आ रहा था कि अब लाला के पैसे किसे चुकाऊंगा वो पिछली बार ही बोल के गया था कि इस बार अगर पैसे नही दिए तो मेरी झोपड़ी और मेरे बच्चे पर उसका कब्ज़ा हो जायेगा यही सब चल रहा था मेरे दिमाग में मेरे आँखों के आगे अंधेरा हो गया था ना मुझे कुछ दिख रहा था और ना ही कुछ समझ में आ रहा था कि किया करू बस खेतो को मैं घूरे जा रहा था और आगे बढ़ रहा था ।अचानक मैं सीधे जमीन पे जा गिरा और फिर कभी नही उठा एकाएक मुझे सब कुछ हल्का लगने लगा मेरा शरीर खेत के पानी में फसलो के बीच में तैर रहा था अब ना ही कोई चिंता थी ना ही किसी बात की फ़िक्र बस पानी के ऊपर तैरे जा रहा था।।

फैसला

                 फैसला

सुमी के अंदर वे सारे गुण मौजूद थे, जो सामाजिक मर्यादा, शालीनता एवं शिष्टता के लिए एक नारी में होने चाहिए. फिर न जाने क्यों वो मेरी ओर आकर्षित हो गई? इसे वह व्यभिचार नहीं मानती. सुमी सदा यही कहती, “यह तो मेरी अतृप्त आकांक्षा की विवशता है. एक निःस्वार्थ समर्पण है… भावनाओं का समन्वय है.” यह तो अच्छा हुआ कि पति के स्थानांतरण के कारण वह बहुत दूर चली आई, वरना कलंक का टीका लग ही जाता.

 अपरिचित शहर, अपरिचित लोग और नया स्टेशन. मैं ट्रेन से उतर पड़ा. प्रातः की ठंडी बयार ने शरीर को कंपकंपा दिया. रोम-रोम सिहर उठा. लगा सुमी का लहराता आंचल होंठों को छू गया है. यह सत्य है कि सुमी के लहराते आंचल के स्पर्श से ही मेरा रोम-रोम सिहर उठता था. आज पुनः सुमी के क़रीब जा रहा हूं. एक लंबी चुप्पी के बाद उसका पत्राचार, मुलाक़ात का आमंत्रण…! उसके अलगाव ने तो धीरे-धीरे अतीत पर अंकित अफ़साने को अमिट कर ही डाला था, इस ठंडी बयार ने न जाने कैसे ज़ख़्म उधेड़ दिया.

एक बार और यूं ही सुमी के आमंत्रण पर उसके गांव गया था. तब समय अनुकूल था और सुमी स्टेशन पर ही रिसीव करने आई थी. आशान्वित नयनों में थी प्रसन्नता की चमक और होंठों पर बहुत कुछ कहने की बेताबी. शाम को उसके साथ गंगा किनारे सैर करने गया था. बालू की रेत पर बैठे उसे अपलक निहारने लगा. मेरी निर्निमेष दृष्टि के समक्ष उसने एक प्रश्‍न अंकित कर दिया, “यूं घूर-घूर क्या देख रहे हो?”
“सोच रहा हूं, तुम मेरी ज़िंदगी में पहले क्यों नहीं आई?”
“तब मैं शायद तुम्हारे क़ाबिल ही नहीं थी.”
उसने मेरे आग्रह पर एक गीत सुनाया था- बिल्कुल वही गीत, जो मेरी डायरी में अंकित था, जो मेरी लेखनी की तड़प थी. दिल की व्याकुलता का भाव था. लिखा था सुमी के लिए और उसने गाया मेरे लिए. उस समय जो उसका रूप देखा, प्रेरणा का प्रतीक था. और सुमी मेरी प्रेरणा बन गई.
आज उसी प्रेरणा की पुकार मुझे यहां खींच लाई थी. स्टेशन से बाहर निकलते ही सिगरेट सुलगाई, एक कस खींचने के बाद जेब से पत्र निकालकर उस तक पहुंचने के निर्देशों को पुनः पढ़ा और मेन रोड की ओर बढ़ चला. थोड़ी दूर जाने पर ही मंदिर की घंटी सुनाई पड़ी और मैं मंदिर के सम्मुख पल भर के लिए रुक गया. मुझे याद है कि जीवन में स़िर्फ एक बार ही मंदिर के अंदर प्रविष्ट हुआ हूं- सुमी के साथ. वह भी काफ़ी तर्क-वितर्क के बाद. सुमी ने प्रश्‍न किया था, “तुम ईश्‍वर को क्यों नहीं मानते?”
“इसलिए कि ईश्‍वर मात्र एक कल्पना है और इस वैज्ञानिक युग में कल्पना के सहारे जीना बेवकूफ़ी है. हां, आत्मबल के लिए ईश्‍वर की कल्पना सटीक है.”
“मगर ईश्‍वर तो सर्व-शक्तिमान एवं इस जग के सृष्टा हैं.”
“दुनिया के अन्य देशों के मुक़ाबले हमारे देश में सबसे ज़्यादा ईश्‍वर भक्त व आस्तिक हैं, फिर भी हमारा देश इतना पिछड़ा है.”
“तो क्या इतने लोग नामसझ हैं?”
“नहीं, नासमझ नहीं हैं. लोग मंदिरों में जाकर अपने आस्तिक होने का ढोंग रचते हैं.”
फिर वह चुप हो गई, परंतु मैं उसका आग्रह न टाल सका. मैं द्वार पर खड़ा रहा और वह पूजा करने गई. लौटकर माथे पर टीका लगा दिया. मैंने दोनों हाथ जोड़ दिए. वह आश्‍चर्य से मुझे देखने लगी.
“किसे प्रणाम कर रहे हो?”
“तुम्हें?”
“क्यों?”
“सुमी, तुम मेरे मन-मंदिर की देवी हो. इस भटकते मुसाफिर को तुम्हारे प्यार ने अपने पाश में बांधकर प्रगतिपथ पर अग्रसर होने हेतु प्रेरित किया है.”
“इस नश्‍वर शरीर के प्रति इतनी आस्था! हास्यास्पद-सी बात लगती है.”
“आदमी की आस्था का केंद्र यदि आदमी ही हो, तो प्रगतिशील समाज का निर्माण हो सकता है.”
वैसे आस्था और भावना तो सुमी के प्रति आज भी मेरे दिल में है. परंतु आज समझ रहा हूं कि इस वैज्ञानिक युग में आस्था और भावुकता के लिए कोई जगह नहीं है. सुमी के प्रति मेरा प्यार एक दुस्साहस है. संस्कारों एवं रस्मों के समक्ष आलोचना का विषय है.
प्यार… वह भी एक विवाहिता से? हां, सुमी की ज़िंदगी में मैं तभी आया, जब वह किसी की दुल्हन बन चुकी थी. शादी के बाद बेमेल स्वभाव के कारण उसके अंदर कुछ रिक्तता थी. न जाने कैसे मैं उन रिक्त स्थानों को भरने लगा और वहीं से आकर्षण का अंकुर फूट पड़ा. जब उस पर चाहत की ओस गिरी तो प्यार की कोपल खिल उठी.
सुमी के अंदर वे सारे गुण मौजूद थे, जो सामाजिक मर्यादा, शालीनता एवं शिष्टता के लिए एक नारी में होने चाहिए. फिर न जाने क्यों वो मेरी ओर आकर्षित हो गई? इसे वह व्यभिचार नहीं मानती. सुमी सदा यही कहती, “यह तो मेरी अतृप्त आकांक्षा की विवशता है. एक निःस्वार्थ समर्पण है… भावनाओं का समन्वय है.” यह तो अच्छा हुआ कि पति के स्थानांतरण के कारण वह बहुत दूर चली आई, वरना कलंक का टीका लग ही जाता.
आज पहली बार इस दूरी को तय करने का प्रयास किया. स्कूल के क़रीब आकर रुक गया. दो आशान्वित नयन दिखाई दिए. वह झट से क्लास से बाहर आकर मेरे सामने खड़ी हो गई. मैंने उसकी तरफ़ ग़ौर से देखा. नज़रें मिलीं और मिलते ही उसकी आंखों से आंसू के दो मोती टपक पड़े. यह वह सुमी नहीं थी, जिसे मैंने चाहा था. चार वर्षों में ही इतना परिवर्तन. न वह चंचल नयना, न शोख लटें और न ही अधरों पर मुस्कान. गोरे-गोरे गालों पर काली-काली झाइयां शायद पीड़ा की छाप हों. यह तो सुमी का सुड़ौल शरीर नहीं, बल्कि किसी मरीज़ का शरीर है. वह बरबस मुस्कुराने का प्रयास करने लगी.
“कैसे हो?” सुमी की उत्सुकता
फूट पड़ी.
“ठीक ही हूं.” मैंने औपचारिकता निभाई.
“घर चलोगे न?” सुमी का आग्रह भरा स्वर लगा.
“नहीं, चलो कहीं होटल में चलें.”
“नहीं, घर चलो.” पुनः ज़िद की, मैं आग्रह टाल न सका.
“घर में कौन-कौन हैं?”
“दीदी, ननद… सब हैं, स़िर्फ वो नहीं.”
“लोग पूछेंगे, तो क्या कहोगी?”
“लोगों को कुछ जवाब देने से बेहतर है ख़ामोश रहूंगी.”
हम दोनों एक साथ चल पड़े. न जाने क्यों आज कुछ बातें करने में झिझक-सी महसूस हो रही थी. पता नहीं, कितनी बार इस तरह पैदल गप्पे मारते हम दोनों गंतव्य स्थान से आगे तक निकल गए थे, परंतु आज… नहीं आज शायद सुमी वह सुमी नहीं रही या फिर मैं ही कुछ दब्बू-सा हो गया. दोनों के बीच एक चुप्पी, एक ऐसी चुप्पी कि इंसान तो ख़ामोश रहता है, मगर अंतर्मन में हाहाकार मच जाता है. बातचीत का सिलसिला आख़िरकार मैंने ही शुरू किया, “तुमने टीचिंग जॉब ज्वाइन कर लिया?”
“अपने आपको व्यस्त रखने के लिए.” सुमी का संक्षिप्त उत्तर था.
“क्यों घर में व्यस्त नहीं रह पाती?”
“वहां बहाना ढूंढ़ना पड़ता था. चेहरे पर सदा अतीत की कुछ छाया छाई रहती थी, जिससे वो शंकित नयनों ने निहारते रहते थे.”
“बबलू कैसा है?” मैंने बात का रुख बदला.
“बबलू और पिंकी दोनों ठीक हैं.”
मैं थोड़ा असहज हो गया. तो सुमी दो बच्चों की मां बन गई, परंतु अभी तक पूर्ण पत्नी नहीं बन सकी. तब लगा कि शरीर के मिलन से कहीं ज़्यादा भावनाओं का समन्वय… विचारों का मिलन… प्यार का आदान-प्रदान ऊंचा होता है. रिश्ते में जकड़ कर रहना शायद मजबूरी है, परंतु प्यार के पाश में बंध जाना ही सच्ची आत्मीयता है.
“तुम कैसे हो?” बहुत देर के बाद सुमी ने एक प्रश्‍न किया.
“बस, जी रहा हूं.” पलभर मौन के बाद बोला.
वह एक लंबी सांस खींचकर पुनः मौन हो गई, मैं पुनः कुछ प्रश्‍न ढूंढ़ने लगा. पता नहीं क्यों सुमी के क़रीब चुप रहना नहीं चाहता, जबकि मुझे तन्हाई ही पसंद है. अचानक मैं चौंक गया जैसे कुछ भूल रहा था. हां, भूल ही तो रहा था वो प्रश्‍न, जो सर्वप्रथम करना चाहिए था. “मुझे बुलाने की वजह?” आवाज़ में कुछ ज़ोर लगाकर बोला.
“बताऊंगी इत्मीनान से… पहले घर चलो.” बहुत देर के बाद उसने अतीत की मुस्कान बिखेरकर तिरछी नज़रों से निहारा.
घर का दरवाज़ा उसकी ननद ने खोला. चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं… ज़ुबान से कोई शब्द नहीं निकला. उसकी पूर्वानुसार उपेक्षा से मैं आहत हो गया. मैंने इसी उपेक्षा के भय से मिलनस्थल होटल चुना था, परंतु सुमी के फैसले के विपरीत फैसला कभी नहीं कर पाया. यह मेरी एक कमज़ोरी थी.
मैं ग़ौर से कमरे को निहारने लगा. कहीं भी रौनक़ नज़र नहीं आई. बस, दीवारों पर उदासी की स़फेदी पुती लगी. सुमी की ननद बेला का पुनः आना, बेमन से नाश्ता देना मानो मैंने यहां आकर बहुत ज़्यादती की. फिर उनकी दीदी आई. औपचारिकता निभाने हेतु कुछ बातें कीं, तब कुछ राहत महसूस हुई.
फिर सुमी आई पिंकी को गोद में लिए. मैं पता नहीं किस अधिकारवश उसे गोद में लेने के लिए खड़ा हो गया. पिंकी हंसती हुई मेरी गोद में आने लगी. तब काफ़ी सावधानी के बाद भी मेरी उंगलियां उसके उरोजों से टकरा गईं. पूरे शरीर में झनझनाहट हो गई. एक अतृप्त प्यास दौड़ पड़ी. सुमी इसे जान-बूझकर की गई हरकत समझ तीव्र नज़रों से निहारने लगी. तब पहली बार मेरा अस्तित्व उसके समक्ष बौना हो गया. मैं शर्म से पानी-पानी हो गया, परंतु अपनी घबराहट छिपाने के लिए मैं बोल पड़ा, “बड़ी प्यारी है पिंकी.” नयन-नक्श बिल्कुल तुम्हारे जैसे ही हैं… प्रेरणा की पुष्प लगती है.”
सुमी अंदर चली गई. मैं पिंकी के साथ खेलने लगा, जिस तरह एक बाप अपनी बेटी से खेलता है. तभी बेला आई. न जाने क्यों उसके आते ही मैं सहम गया. पिंकी के साथ मेरा वात्सल्य जताना उसे अच्छा न लगा. वह पिंकी को मेरी गोद से लेकर चली गई.
उसके बाद औपचारिकता का दौर, नहाना-खाना… परिचितों के उत्थान-पतन का ब्यौरा. ऐसा लग रहा था कि सभी अपने औपचारिकता रूपी अभिनय को छिपाने का प्रयास कर रहे हैं. फिर रात भी आ गई. सुमी ने सेवईं बनाई थी. उसे मालूूम है कि सेवईं मुझे बहुत पसंद है. बहुत दिनों के बाद जी भरकर खाना खाया. सोने की तैयारी करने से पहले सुमी ने पूछा, “कमरे में बहुत उमस है. छत पर सोना पसंद करोगे?”
“तुम्हें तो मालूम है कि मुझे खुली हवा बेहद पसंद है.”
“तो फिर चलो, छत पर बिस्तर लगा देती हूं.”
खुली छत, चांदनी रात, शीतल पवन और मैं अकेला. पहले करवटें बदलीं, तो पवन ने शरीर को गुदगुदा दिया. फिर मैं चादर ओढ़कर सोने का उपक्रम करने लगा, पर नींद भी इतनी ज़ालिम है कि ऐन व़क़्त पर दगा दे जाती है. सुकून के व़क़्त तो चुपचाप आकर लिपट जाती है. घड़ियाल ने बारह के घंटे बजाए, तभी सुमी एक ग्लास पानी लेकर आई. उसे मालूम है कि आधी रात को उठकर पानी पीना, कुछ लिखना मेरी आदत है.
सुमी मेरे क़रीब आकर बैठ गई और उसने पानी का ग्लास बढ़ा दिया. मैं भी उठ बैठा और बड़ी हसरत भरी निगाहों से उसे देखा. खुली ज़ुल्फ़ों एवं नाइटी में बड़ी भली लगी सुमी. भावावेश में ग्लास पकड़ने की बजाय मैंने उसकी कलाई पकड़ ली. मेरा संयम लड़खड़ा गया. उंगलियों का कसाव तीव्र हो गया. तभी पानी भरा ग्लास गिर पड़ा. उसका बदन कांपने लगा. चेहरा भयभीत हो गया, शायद जिस विश्‍वास की आशा थी वह टूटता-सा लगा.
बड़ी मुश्किल से वह बोल पाई. “जिन अरमानों को बड़ी मुश्किल से सुलाया है, उन्हें फिर से मत जगाओ. यह सच है कि मैं तुम्हारे समक्ष बहुत कमज़ोर हो जाती हूं. अब इतनी कमज़ोर भी मत बना दो कि जीने के लायक़ ही न रह सकूं.”
“सुमी… तुमसे मिलने के लिए मैं कितना बेचैन था, फिर भी कभी आने का साहस न किया. तुम्हारे पास आने से मैं भी कमज़ोर हो जाता हूं. मैं तुम्हारे परिवार में अशांति का बीज बोना नहीं चाहता. मुझे यहां नहीं आना चाहिए था सुमी.”
“मैंने तुम्हें यह पूछने के लिए बुलाया है कि तुम शादी कब करोगे?”
“अभी कुछ फैसला नहीं कर पाया हूं?”
“कब करोगे फैसला? कुछ फैसले समयानुकूल ही उचित होते हैं. कब तक अपने आपको झूठी तसल्ली देते रहोगे? समाज के भी कुछ नियम हैं… दायरे हैं.”
“मैं समझता हूं, परंतु पता नहीं क्यों…?”
“तुम अब जल्द ही शादी कर लो.” बहुत देर के बाद सुमी ने अधिकार भरे शब्दों में अपना फैसला सुनाया. वह जानती है कि उसके फैसले के विरुद्ध फैसला नहीं कर पाना मेरी कमज़ोरी है.
“यह तुम कह रही हो सुमी?” मैंने आश्‍चर्य से पूछा. “हां, मैं कह रही हूं… तुम्हारी सुमी नहीं, दो बच्चों की मां कह रही है… पति से अपने अधिकारों के लिए लड़ती हुई एक पत्नी कह रही है. आख़िर मैं कब तक तिरस्कृत होती रहूंगी? दो बच्चों की मां हो गई. कल को बच्चे बड़े होंगे, तो इस वैमनस्य को देखकर क्या सोचेंगे? …शायद तुम नहीं जानते कि उन्हें यह भ्रम हो गया है कि तुम अभी तक मेरा इंतज़ार कर रहे हो और मैं भी अभी तक आस संजोए बैठी हूं. एक साथ तीन ज़िंदगियां तबाह हो रही हैं… तुम तो बहुत महत्वाकांक्षी हो… आगे बढ़ो और सबकी ज़िंदगियां आबाद कर दो.” इतना कहकर सुमी सुबकती हुई चली गई.
मैं अवाक् हो शून्य को ताकने लगा. रात का तीसरा पहर समाप्त हो चुका था… चल पड़ा मैं पहली ट्रेन पकड़ने… ज़िंदगी में पहली बार पराजित हुआ था, फिर भी सुमी के फैसले के विरुद्ध फैसला करने का साहस न जुटा सका।

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दहेज

                                 दहेज़ 

चौबे जी का लड़का है अशोक, एमएससी पास। नौकरी के लिए चौबे जी निश्चिन्त थे, कहीं न कहीं तो जुगाड़ लग ही जायेगी। बियाह कर देना चाहिए। मिश्रा जी की लड़की है ममता, वह भी एमए पहले दर्जे में पास है, मिश्रा भी उसकी शादी जल्दी कर देना चाहते हैं।
सयानों से पोस्ट ग्रेजुएट लड़के का भाव पता किया गया। पता चला वैसे तो रेट पांच से छः लाख का चल रहा है, पर बेकार बैठे पोस्ट ग्रेजुएटों का रेट तीन से चार लाख का है। सयानों ने सौदा साढ़े तीन में तय करा दिया।
बात तय हुए अभी एक माह भी नही हुआ था, कि कमीशन से पत्र आया कि अशोक का डिप्टी कलक्टर के पद पर चयन हो गया है।
चौबे जी – साले, नीच, कमीने… हरामजादे हैं कमीशन वाले…!

चौबन – लड़के की इतनी अच्छी नौकरी लगी है नाराज क्यों होते हैं?
चौबे- अरे सरकार निकम्मी है, मैं तो कहता हूँ इस देश में क्रांति होकर रहेगी… यही पत्र कुछ दिन पहले नहीं भेज सकते थे, डिप्टी कलेक्टर का 40-50 लाख यूँ ही मिल जाता।

चौबन- तुम्हारी भी अक्ल मारी गई थी, मैं न कहती थी महीने भर रुक जाओ, लेकिन तुम न माने… हुल-हुला कर सम्बन्ध तय कर दिया… मैं तो कहती हूँ मिश्रा जी को पत्र लिखिये वे समझदार आदमी हैं।
प्रिय मिश्रा जी, अत्र कुशलं तत्रास्तु!

आपको प्रसन्नता होगी कि अशोक का चयन डिप्टी कलेक्टर के लिए हो गया है। विवाह के मंगल अवसर पर यह मंगल हुआ। इसमें आपकी सुयोग्य पुत्री के भाग्य का भी योगदान है।

आप स्वयं समझदार हैं, नीति व मर्यादा जानते हैं। धर्म पर ही यह पृथ्वी टिकी हुई है। मनुष्य का क्या है, जीता मरता रहता है। पैसा हाथ का मैल है, मनुष्य की प्रतिष्ठा बड़ी चीज है। मनुष्य को कर्तव्य निभाना चाहिए, धर्म नहीं छोड़ना चाहिए। और फिर हमें तो कुछ चाहिए नहीं, आप जितना भी देंगे अपनी लड़की को ही देंगे।
मिश्रा परिवार ने पत्र पढ़ा, विचार किया और फिर लिखा-
प्रिय चौबे जी, आपका पत्र मिला, मैं स्वयं आपको लिखने वाला था। अशोक की सफलता पर हम सब बेहद खुश हैं। आयुष्मान अब डिप्टी कलेक्टर हो गया हैं। अशोक चरित्रवान, मेहनती और सुयोग्य लड़का है। वह अवश्य तरक्की करेगा।

आपको जानकर प्रसन्नता होगी कि ममता का चयन आईएएस के लिए हो गया है। आयुष्मति की यह इच्छा है कि अपने अधीनस्थ कर्मचारी से वह विवाह नहीं करेगी। मुझे यह सम्बन्ध तोड़कर अपार हर्ष हो रहा है।

भिखारी

                                भिखारी

‘ओ साहिब जी, एक भूखे बेचारे पर दया कीजिए। तीन दिन का भूखा हूं। रात बिताने के लिए जेब में एक पैसा भी नहीं। पूरे आठ साल तक गांव के एक स्कूल में मास्टर रहा। बड़े लोगों की बदमाशी से नौकरी चली गई। जुल्म का शिकार बना हूं। अभी साल पूरा हुआ है बेरोजगार भटकते फिरते हुए।’

बैरिस्टर स्क्वार्त्सोफ़ ने भिखारी के मैले-कुचैले कोट, नशे से गंदली आंखें, गालों पर लगे हुए लाल धब्बे देखे। उन्हें लगा कि इस आदमी को कहीं पहले देखा है।

‘अभी मुझे कलूगा जिले में नौकरी मिलने ही वाली है’, भिखारी आगे बोलता गया, ‘पर उधर जाने के लिए पैसे नहीं हैं। कृपा करके मदद कीजिए साहिब। भीख मांगना शर्म का काम है, पर क्या करूं, मजबूर हूं।’ स्क्वार्त्सोफ़ ने उसके रबर के जूतों पर नजर डाली जिन में से एक नाप में छोटा और एक बड़ा था तो उन्हें एकदम याद आया, ‘सुनिए, तीन दिन पहले मैं ने आपको सदोवाया सड़क पर देखा था’, बैरिस्टर बोले, ‘आप ही थे न ? पर उस वक़्त आपने मुझे बताया था आप स्कूल मास्टर नहीं, बल्कि छात्र हैं जिसे कॉलेज से निकाल दिया गया है। याद आया?’

‘न…नहीं… यह नहीं हो सकता’, भिखारी घबराकर बुदबुदाया। ‘मैं गांव में मास्टर ही था। चाहें तो कागज़ात दिखा दूं।’

‘झूठ मत बोलो। तुमने मुझे बताया था कि तुम एक छात्र हो, कॉलेज छूटने की कहानी भी सुनाई थी मुझे। याद आया?’

स्क्वार्त्सोफ साहब का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। घृणा से मुंह बिचकाकर वह भिखारी से दो कदम पीछे हट गए। फिर क्रोध भरे स्वर में चिल्लाए, ‘कितने नीच हो तुम। बदमाश कहीं के। मैं तुम्हें पुलिस के हवाले कर दूंगा। भूखे हो, ग़रीब हो, यह ठीक है, पर इस बेशर्मी से झूठ क्यों बोलते हो?’

भिखारी ने दरवाजे के हत्थे पर अपना हाथ रखकर पकड़े गए चोर की तरह नजर दौडाई।

‘मैं…मैं झूठ नहीं बोलता।’ वह बुदबुदाया, ‘मैं कागजात…’

‘अरे कौन विश्वास करेगा,’ स्क्वार्त्सोफ साहिब का क्रोध बढ़ता गया। गांव के मास्टरों और गरीब विद्यार्थियों पर समाज जो सहानुभूति दिखाता आया है, उस से लाभ उठाना कितना गंदा, नीच और घिनौना काम है।

स्क्वार्त्सोफ़ साहब क्रोध से आग बबूला हो उठे और भिखारी को बुरी तरह कोसने लगे। अपनी इस निर्लज्ज धोखेबाजी से उस आवारा आदमी ने उनके मन में घृणा पैदा कर दी थी और उन भावनाओं का अपमान किया था जो स्क्वार्त्सोफ साहब को अपने चरित्र में सब से मूल्यवान लगती थीं। उनकी उदारता, भावुकता, गरीबों पर दया, वह भीख जो वह खुले दिल से मांगनेवालों को दिया करते थे, सब कुछ अपवित्र करके मिट्टी में मिला दिया इस बदमाश ने। भिखारी भगवान् का नाम लेकर अपनी सफाई देता रहा, फिर चुप हो गया और उसने शर्म से सर झुका लिया। फिर दिल पर हाथ रखकर बोला, ‘साहिब, मैं सचमुच झूठ बोल रहा था। न मैं छात्र हूं न मास्टर। मैं एक संगीत मंडली में था। फिर शराब पीने लगा और अपनी नौकरी खो बैठा। अब क्या करूं? भगवान ही मेरा साक्षी है, बिना झूठ बोले काम नहीं चलता। जब सच बोलता हूं तो कोई भीख भी नहीं देता। सच को लेकर भूखों मरना होगा या सर्दी में बेघर जम जाना होगा, बस। कहते तो आप सही हैं, यह में भी समझता हूं, पर क्या करूं?’

‘करना क्या है? तुम पूछ रहे हो कि करना क्या है।’ स्क्वार्त्सोफ साहब उसके निकट आकर बोले, ‘काम करना चाहिए। काम करना चाहिए और क्या।’

‘काम करना चाहिए, यह तो मैं भी समझता हूं। नौकरी कहां मिलेगी?’

‘क्या बकवास है। जवान हो, ताकतवर हो, चाहो तो नौकरी क्यों नहीं मिलेगी? पर तुम तो सुस्त हो, निकम्मे हो, शराबी हो! तुम्हारे मुंह से वोदका की बदबू आ रही है जैसे किसी शराब की दूकान से आती है। झूठ, शराब और आरामतलबी तुम्हारे खून की बूंद-बूंद पहुंच चुके हैं। भीख मांगने और झूठ बोलने के अलावा तुम और कुछ जानते ही नहीं। कभी नौकरी कर लेने का कष्ट उठा भी लेंगे जनाब तो बस किसी दफ्तर में या संगीत मंडली में या किसी और जगह जहां मक्खी मारते-मारते पैसे कमा लें। मेहनत-मजदूरी क्यों नहीं करते? भंगी या कुली क्यों नहीं बन जाते? ख़ुद को बहुत ऊंचा समझते हो।’
‘कैसी बात कर रहे हैं आप?’ भिखारी बोला। मुंह पर एक तिक्त मुस्कान उभरी। मेहनत-मजदूरी कहां से मिलेगी? किसी दुकान में नौकरी नहीं कर सकता, क्योंकि व्यापार बचपन से ही सीखा जाता है। भंगी भी कैसे बनूं, कुलीन घर का हूं। फ़ैक्टरी में भी काम करने के लिए कोई पेशा तो आना चाहिए, मैं तो कुछ नहीं जानता।’

‘बकवास कर रहे हो! कोई न कोई कारण ढूंढ़ ही लोगे। क्यों जनाब, लकडी फाड़ोगे?’

‘मैंने कब  इनकार किया है। पर आज लकड़ी फाड़ने वाले मज़दूर भी तो बेकार बैठे हैं।’

‘सभी निकम्मे लोगों का यही गाना है। मैं मजदूरी दिलवाता तो मुंह फेरकर भागोगे। क्या मेरे घर में लकड़ी फाड़ोगे?’

‘आप चाहें तो क्यों नहीं करूंगा।’

‘वाह रे। देखें तो सही!’

स्क्वार्त्सोफ़ साहब ने जल्दी से अपनी रसोई से अपनी बावरचिन को बुलाया और नाराजगी से बोले, ‘ओल्गा, इन साहब को जलाऊ लकडी की कोठरी में ले जाओ। इनको लकडी फाड़ने के लिए दे दो।’

भिखारी अनमना-सा कंधे हिलाकर बावरचिन के पीछे-पीछे चल पड़ा। उसके चाल-चलन से यह साफ दिखाई दे रहा था कि वह भूख और बेकारी के कारण नहीं, बस अपने स्वाभिमान की वजह से ही यह काम करने के लिए मान गया है। यह भी लग रहा था कि शराब पीते-पीते वह कमजोर और अस्वस्थ हो चुका है। काम करने की कोई भी इच्छा नहीं है उस की।

स्क्वार्त्सोफ साहब अपने डाइनिंग-रूम पहुंचे जहां से आंगन और कोठरी आसानी से दिखाई दे रहे थे। खिड़की के पास खड़े होकर उन्होंने देखा कि बावरचिन भिखारी को पीछे के दरवाजे से आंगन में ले आई है। गंदी-मैली बर्फ को रौंदते हुए वे दोनों कोठरी की ओर बढ़े। भिखारी को क्रोध भरी आंखों से देखती ओल्गा ने कोठरी के कपाट खोल दिए और फिर धड़ाम से दीवार से भिड़ा दिए।

‘लगता है हमने ओल्गा को कॉफी नहीं पीने दी,’ स्क्वार्त्सोफ साहब ने सोचा। ‘कितनी जहरीली औरत है।’ फिर उन्होंने देखा कि झूठा मास्टर लकड़ी के एक मोटे कुंदे पर बैठ गया और अपने लाल गालों को अपनी मुट्ठियों में दबोचकर किसी सोच-विचार में डूब गया। ओल्गा ने उसके पैरों के पास कुल्हाड़ी फेंककर नफरत से थूक दिया और गालियां बकने लगी। भिखारी ने डरते-डरते लकड़ी का एक कुंदा अपनी ओर खींचा और उसे अपने पैरों के बीच रखकर कुल्हाड़ी का एक कमजोर-सा वार किया। कुंदा गिर गया। भिखारी ने उसे दुबारा थामकर और सर्दी से जमे हुए अपने हाथों पर फूंक मारकर कुल्हाड़ी इस तरह चलाई जैसे वह डर रहा हो कि कहीं अपने घुटने या पैरों की ऊंगलियों पर ही प्रहार न हो जाए। लकड़ी का कुंदा फिर गिर गया।

स्क्वार्त्सोफ साहब का क्रोध टल चुका था। उन्हें खुद पर कुछ-कुछ शर्म आने लगी कि इस निकम्मे, शराबी और शायद बीमार आदमी से सर्दी में भारी मेहनत-मजदूरी किसलिए करवाई।

‘चलो, कोई बात नहीं’, अपने लिखने-पढ़ने के कमरे में जाते समय उन्होंने सोचा, उसकी भलाई ही होगी। एक घंटे बाद ओल्गा ने अपने मालिक को सूचित किया कि काम पूरा हो गया है।  

‘लो, उसे पचास कोपेक दे दो’, स्क्वार्त्सोफ साहब ने कहा, ‘चाहो तो हर पहली तारीख को लकड़ी फाड़ने आ जाया करो। काम मिल जाएगा।’

अगले महीने की पहली तारीख को भिखारी फिर आ गया। शराब के नशे में लड़खड़ाने पर भी उसने पचास कोपेक कमा ही लिए। उस दिन से वह जब-तब आया ही करता था। हर बार कोई न कोई काम कर ही लेता।  कभी आंगन से बर्फ हटाता था, कभी कोठरी साफ करता था, कभी कालीनों और मेट्रेसों से धूल निकालता था। हर बार वह बीस-चालीस कोपेक कमाता था और एक बार स्क्वार्त्सोफ साहब ने उसे अपने पुराने पतलून भी भिजवाए थे। 

नए फ्लैट में जाते समय स्क्वार्त्सोफ साहब ने उसे फर्नीचर बांधने और उठाकर ले जाने में कुलियों की मदद करने को कहा। उस दिन भिखारी संजीदा, उदास और चुप्पा था। फर्नीचर पर हाथ बहुत कम रखता था, सर झुकाए इधर-उधर मंडरा रहा था। काम करने का बहाना भी नहीं कर रहा था, बस सर्दी से सिकुड़ता रहा था और जब दूसरे कुली उसकी सुस्ती, कमजोरी और फटे-पुराने, ‘साहब किस्म के’ ओवरकोट का मजाक उड़ाते थे तो शरमाता रहा था। काम पूरा हुआ तो स्क्वार्त्सोफ साहब ने उसे अपने पास बुला भेजा। 

‘लगता है, तुम पर मेरी बातों का कुछ असर पड़ा है’, भिखारी के हाथ में एक रूबल पकडाते हुए उन्होंने कहा, ‘यह लो अपनी कमाई। देखता हूं तुमने पीना छोड़ दिया है और मेहनत के लिए तैयार हो। हां, नाम क्या है तुम्हारा?’

‘जी, लुश्कोफ।’

‘तो, लुश्कोफ अब मैं तुम्हें कोई दूसरा और साफ-सुथरा काम दिलवा सकता हूं। पढ़ना-लिखना जानते हो?’

‘जी हां।’

‘तो यह चिट्ठी लेकर कल मेरे एक दोस्त के यहां चले जाना। कागजातों की नक़ल करने की नौकरी है। सच्चे मन से काम करना, शराब मत पीना, मेरा कहना मत भूलना। जाओ।’

एक पापी को सही रास्ता दिखाकर स्क्वार्त्सोफ साहब बहुत प्रसन्न थे। उन्होंने लुश्कोफ के कंधे पर एक प्यार की थपकी दी और उसे छोड़ने बाहर दरवाज़े तक आए  फिर उससे हाथ भी मिलाया। लुश्कोफ वह चिट्ठी लेकर चला गया और उस दिन के बाद फिर कभी नहीं आया।

***
दो साल बीत गए। एक दिन थिएटर की टिकट-खिड़की के पास स्क्वार्त्सोफ साहब को छोटे कद का एक आदमी दिखाई दिया। वह भेड़ के चमड़े की गरदनी वाला ओवरकोट और एक पुरानी-सी पोस्तीन की टोपी पहने हुए था। उसने डरते-डरते सब से सस्ता टिकट मांगा और पांच-पांच कोपेक के सिक्के दे दिए।

‘अरे, लुश्कोफ़, तुम।’ स्क्वार्त्सोफ ने अपने उस मजदूर को पहचान लिया, ‘कैसे हो? क्या करते हो? जिंदगी ठीक-ठाक है न?’

‘जी हां, ठीक-ठाक है, साहिब जी। अब मैं उसी नोटरी के यहां काम करता हूं, पैंतीस रूबल कमाता हूं।’

‘कृपा है भगवान की। वाह, भाई, वाह। बड़ी खुशी की बात है! बहुत प्रसन्न हूं। सच पूछो तो तुम मेरे शिष्य जैसे हो न। मैंने तुम्हे एक सच्चा रास्ता दिखाया था। याद है, कितना कोसा था तुमको? कान गर्म हुए होंगे मेरी बातें सुनकर। धन्य हो, भाई, कि मेरे वचनों को तुम भूले नहीं।’

‘धन्य हैं आप भी,’ लुश्कोफ बोला, ‘आपके पास न आता तो अब तक खुद को मास्टर या छात्र बतलाकर धोखेबाजी करता फिरता। आपने मुझे खाई से निकालकर डूबने से बचाया है।’

‘बहुत, बहुत खुशी की बात है।’

‘आपने बहुत अच्छा कहा भी और किया भी। मैं आपका आभारी हूं और आपकी बावरचिन का भी, भगवान उस दयालु उदार औरत की भलाई करे। आपने उस समय बहुत सही और अच्छी बातें की थी, मैं उम्र भर आपका आभारी रहूंगा। पर सच पूछिए  तो आपकी बावरचिन ओल्गा ही ने मुझे बचाया है।’

‘वह कैसे?’

‘बात ऐसी है साहिब जी। जब-जब मैं लकड़ी फाड़ने आया करता था वह मुझे कोसती रहती, ‘अरे शराबी। तुझ पर जरूर कोई शाप लग गया है। मर क्यों नहीं जाता।’ फिर मेरे सामने उदास बैठ जाती और मेरा मुंह  देखते-देखते रो पड़ती, ‘हाय बेचारा’ इस लोक में कोई भी ख़ुशी नहीं देख पाया और परलोक में भी नरक की आग में ही जाएगा। हाय बेचारा, दुखियारा।’ वह बस इसी ढंग की बातें किया करती थी। उसने अपना कितना खून जलाया मेरे कारण, कितने आंसू बहाए, मैं आपको बता नहीं सकता। पर सब से बड़ी बात यह हुई कि वह ही मेरा सारा काम पूरा करती रहती थी। सच कहता हूं साहिब, आपके यहां मैंने एक भी लकड़ी नहीं फाड़ी, सब कुछ वही करती थी। उसने मुझे कैसे बचाया, उसको देखकर मैंने पीना क्यों छोड़ दिया, क्यों बदल गया मैं, आपको कैसे समझाऊं। इतना ही जानता हूं कि उसके वचनों और उदारता की वजह से मैं सुधर गया और मैं यह कभी नहीं भूलूंगा। हां साहिब जी, अब जाना है, नाटक शुरू होने की घंटी बज रही है।

लुश्कोफ सर झुकाकर अपनी सीट की ओर बढ़ गया।

आज ही क्यों नहीं ? 

आज ही क्यों नहीं ? 

एक बार की बात है कि एक शिष्य अपने गुरु का बहुत आदर-सम्मान किया करता था |गुरु भी अपने इस शिष्य से बहुत स्नेह करते थे लेकिन  वह शिष्य अपने अध्ययन के प्रति आलसी और स्वभाव से दीर्घसूत्री था |सदा स्वाध्याय से दूर भागने की कोशिश  करता तथा आज के काम को कल के लिए छोड़ दिया करता था | अब गुरूजी कुछ चिंतित रहने लगे कि कहीं उनका यह शिष्य जीवन-संग्राम में पराजित न हो जाये|आलस्य में व्यक्ति को अकर्मण्य बनाने की पूरी सामर्थ्य होती है |ऐसा व्यक्ति बिना परिश्रम के ही फलोपभोग की कामना करता है| वह शीघ्र निर्णय नहीं ले सकता और यदि ले भी लेता है,तो उसे कार्यान्वित नहीं कर पाता| यहाँ तक कि  अपने पर्यावरण के प्रति  भी सजग नहीं रहता है और न भाग्य द्वारा प्रदत्त सुअवसरों का लाभ उठाने की कला में ही प्रवीण हो पता है | उन्होंने मन ही मन अपने शिष्य के कल्याण के लिए एक योजना बना ली |एक दिन एक काले पत्थर का एक टुकड़ा उसके हाथ में देते हुए गुरु जी ने कहा –‘मैं तुम्हें यह जादुई पत्थर का टुकड़ा, दो दिन के लिए दे कर, कहीं दूसरे गाँव जा रहा हूँ| जिस भी लोहे की वस्तु को तुम इससे स्पर्श करोगे, वह स्वर्ण में परिवर्तित हो जायेगी| पर याद रहे कि दूसरे दिन सूर्यास्त के पश्चात मैं इसे तुमसे वापस ले लूँगा|’

 शिष्य इस सुअवसर को पाकर बड़ा प्रसन्न हुआ लेकिन आलसी होने के कारण उसने अपना पहला दिन यह कल्पना करते-करते बिता दिया कि जब उसके पास बहुत सारा स्वर्ण होगा तब वह कितना प्रसन्न, सुखी,समृद्ध और संतुष्ट रहेगा, इतने नौकर-चाकर होंगे कि उसे पानी पीने के लिए भी नहीं उठाना पड़ेगा | फिर दूसरे दिन जब वह  प्रातःकाल जागा,उसे अच्छी तरह से स्मरण था कि आज स्वर्ण पाने का दूसरा और अंतिम दिन है |उसने मन में पक्का विचार किया कि आज वह गुरूजी द्वारा दिए गये काले पत्थर का लाभ ज़रूर उठाएगा | उसने निश्चय किया कि वो बाज़ार से लोहे के बड़े-बड़े सामान खरीद कर लायेगा और उन्हें स्वर्ण में परिवर्तित कर देगा. दिन बीतता गया, पर वह इसी सोच में बैठा रहा की अभी तो बहुत समय है, कभी भी बाज़ार जाकर सामान लेता आएगा. उसने सोचा कि अब तो  दोपहर का भोजन करने के पश्चात ही सामान लेने निकलूंगा.पर भोजन करने के बाद उसे विश्राम करने की आदत थी , और उसने बजाये उठ के मेहनत करने के थोड़ी देर आराम करना उचित समझा. पर आलस्य से परिपूर्ण उसका शरीर नीद की गहराइयों में खो गया, और जब वो उठा तो सूर्यास्त होने को था. अब वह जल्दी-जल्दी बाज़ार की तरफ भागने लगा, पर रास्ते में ही उसे गुरूजी मिल गए उनको देखते ही वह उनके चरणों पर गिरकर, उस जादुई पत्थर को एक दिन और अपने पास रखने के लिए याचना करने लगा लेकिन गुरूजी नहीं माने और उस शिष्य का धनी होने का सपना चूर-चूर हो गया | पर इस घटना की वजह से शिष्य को एक बहुत बड़ी सीख मिल गयी: उसे अपने आलस्य पर पछतावा होने लगा, वह समझ गया कि आलस्य उसके जीवन के लिए एक अभिशाप है और उसने प्रण किया कि अब वो कभी भी काम से जी नहीं चुराएगा और एक कर्मठ, सजग और सक्रिय व्यक्ति बन कर दिखायेगा। 

मित्रों, जीवन में हर किसी को एक से बढ़कर एक अवसर मिलते हैं , पर कई लोग इन्हें बस अपने आलस्य के कारण गवां देते हैं. इसलिए मैं यही कहना चाहती हूँ कि यदि आप सफल, सुखी, भाग्यशाली, धनी अथवा महान  बनना चाहते हैं तो आलस्य और दीर्घसूत्रता को त्यागकर, अपने अंदर विवेक, कष्टसाध्य श्रम,और सतत् जागरूकता जैसे गुणों को विकसित कीजिये और जब कभी आपके मन में किसी आवश्यक काम को टालने का विचार आये तो स्वयं से एक प्रश्न कीजिये – “आज ही क्यों नहीं ?”

कितने पाकिस्तान

कितना लम्बा सफर है! और यह भी समझ नहीं आता कि यह पाकिस्तान बार-बार आड़े क्यों आता रहा है। सलीमा! मैंने कुछ बिगाड़ा तो नहीं तेरा…तब तूने क्यों अपने को बिगाड़ लिया? तू हँसती है…पर मैं जानता हूं, तेरी इस हँसी में जहर बुझे तीर हैं। यह मेहंदी के फूल नहीं हैं सलीमा, जो सिर्फ हवा के साथ महकते हैं। 

हवा ! हँसी आती है इस हवा को सोचकर। तूने ही तो कहा था कि मुझे हवा लग गयी है। याद है उन दिनों की? तुम्हें सब याद है। औरतें कुछ नहीं भूलतीं, सिर्फ जाहिर करती हैं कि भूल गयी हैं। वे ऐसा न करें तो जीना मुश्किल हो जाए। तुम्हें औरत या सलीमा कहते भी मुझे अटपटा लगता है। बन्नो कहने को दिल करता है। वही बन्नो जो मेहंदी के फूलों की खुशबू मिली रहती थी। जब मेरी नाक के पास मेहंदी के फूल लाकर तुम मुंह से उन्हें फूंका करती थीं कि महक उड़ने लगे और कहा करती थीं”इनकी महक तभी उड़ती है जब हवा चलती है…”

सच पूछो तो मुझे वही हवा लग गयी। वही हवा, बन्नो! पर अब तुम्हें बन्नो कहते मन झिझकता है। पता नहीं खुद तुम्हें यह नाम बर्दाश्त होगा या नहीं। और अब इस नाम में रखा भी क्या है।

मेरा मन हुआ था कि उस रात मैं सीढ़ियों से फिर ऊपर चढ़ जाऊं और तुमसे कुछ पूछूं ,कुछ याद दिलाऊं। पर ऐसा क्या था जो तुम्हें याद नहीं होगा!

ओफ! मालूम नहीं कितने पाकिस्तान बन गये एक पाकिस्तान बनने के साथ-साथ। कहां-कहां, कैसे-कैसे, सब बातें उलझकर रह गयी। सुलझा तो कुछ भी नहीं।

वह रात भी वैसी ही थी। पता नहीं पिछवाड़े का पीपल बोला था या बदरू मियां”कादिर मिया/!…बन गया साला पाकिस्तान…भैयन, अब बन गया पूरा पाकिस्तान…”

कितनी डरावनी थी वह चांदनी रात नीचे आंगन में तुम्हीं पड़ी थीं बन्नो…चांदनी में दूध-नहायी और पिछवाड़े पीपल खड़खड़ा रहा था और बदरू मियां की आवांज जैसे पाताल से आ रही थी”कादिर मियां!…बन गया साला पाकिस्तान…”

दोस्त! इस लम्बे सफर के तीन पड़ाव हैंपहला, जब मुझे बन्नो के मेहंदी के फूलों की हवा लग गयी थी, दूसराजब इस चांदनी रात में मैंने पहली बार बन्नो को नंगा देखा था और तीसरा तब, जब उस कमरे की चौखट पर बन्नो हाथ रखे खड़ी थी और पूछ रही थी”और है कोई?”

हां था। कोई और भी था।…कोई।

बन्नो, एक थरथराते अन्धे क्षण के बाद हंसी क्यों थीं? मैंने क्या बिगाड़ा था तेरा ! तू किससे बदला ले रही थी? मुझसे? मुनीर से? या पाकिस्तान से? या किसे जलील कर रही थी मुझे, अपने को, मुनीर को या…

पाकिस्तान हमारे बीच बार-बार आ जाता है। यह हमारे या तुम्हारे लिए कोई मुल्क नहीं है, एक दुखद सचाई का नाम है। वह चीज या वजह जो हमें ज्यादा दूर करती है, जो हमारी बातों के बीच एक सन्नाटे की तरह आ जाती है। जो तुम्हारे घरवालों, रिश्तेदारों या धर्मवालों के प्रति दूसरों के एहसास की गहराई को उथला कर देती है। तब उन दूसरों को उनके इस कोई के दुख उतने बड़े नहीं लगते जितने वे होते हैं, उनकी खुशी उतनी खुशी नहीं लगती जितनी वह होती है। कहीं कुछ कम हो जाता है। एहसास की कुछ ऐसी ही आ गयी कमी का नाम शायद पाकिस्तान हैयानी मेहंदी के फूल हों, पर हवा न चले, या कोई फूँक मारकर उनमें गन्ध न पैदा करे। जैसे कि फूल हों, रंग न हो। रंग हो गन्ध न हो। गन्ध हो, हवा न हो। यानी एहसास की रुकी हुई हवा ही पाकिस्तान हो।

सुनो, अगर ऐसा न होता तो मुझे चुनार छोड़कर दरवेश क्यों बनना पड़ता? वही चुनार जहां मेहंदी फूलती थी। मिशन स्कूल के अहाते के पास जहां से हम गंगा घाट के पीपल तले आते थे और राजा भरथरी के किले की टूटी दीवार पर बैठकर इमलियां खाया करते थे।

वह शाम मुझे अच्छी तरह याद है जब कम्पाउंडर जामिन अली ने आकर दादा से कहा था”और तो कुछ नहीं है, पर लोग मानेंगे नहीं। मंगल को कुछ दिनों के लिए कहीं बांजार भेज दीजिए। यहां रहेगा तो बन्नो वाली बात बार-बार उखड़ेगी। शादी तो नहीं हो पाएगी, दंगा हो जाएगा।”

तुम नहीं सोच सकते कि सुनकर मुझपर क्या बीती थी! चुनार छोड़ दूं ,फिर छूट ही गया…कैसी होती थीं चुनार की रातें…गंगा का पानी। काशी जाती नावें। भरथरी के किले की सूनी दीवारें और गंगा के किनारे चुंगी की वह कोठरी जिसमें छप्पर में बैठकर मैं बन्नो के आने-जाने का अन्दांज लगाया करता था। नालियों की धार से फटी जमीन वाली वे गलियां जिनसे बन्नो बार-बार गंगा-किनारे आने की कोशिश करती थी और आ नहीं पाती थी। इन्तंजार…इन्तंजार…

हमें तो यह भी पता नहीं चला था कि कब हम बड़े मान लिये गये थे। कब हमारा सहज मिलना-जुलना एकाएक बड़ी-बड़ी बातों को बायस बन गया था।

बस्ती में तनाव पैदा हो जाएगा, इसका तो अन्दाज तक नहीं था। यह कैसे और क्यों हुआ, बन्नो? पर तुम्हें भी क्या मालूम होगा। फिर हमने बात ही कहां की?

तीनों पड़ाव ऐसे ही गुजर गयेकहीं रुककर हम बात भी नहीं कर पाए। न तब, जब मेहंदी के फूलों की हवा लगी थी; न तब, जब उस चांदनी रात में तुम्हें पहली बार नंगा देखा था; और न तब, जब चौखट पर हाथ रखे तुम पूछ रही थींऔर है कोई!

मेहंदी के फूल

चुनार! मेरा घर, तुम्हारा घर! मेरे घर से गुजरती थी ईंटोंवाली गलीजो शहर-बांजार को जाती थी। जो गंगा के किनारे-किनारे चलकर भरथरी महाराज के किले के बड़े फाटक तक पहुँचती थी।

जहां से सड़क किले की ओर मुड़ती थी, वहीं थी चुंगी। गंगा-घाट पर लगने वाली नावों से उतरे सामान पर महसूल लगता था। मछली, केंकड़े, कछुए आते थे, मौसम में उस पार से आम भी आते थे। चुंगी वाले मुंशीजी दिन-भर रामनाम जपते और महसूल के बदले में जिंस लेते रहते थे। वे दिन में दस बार पीपल तले के महादेव को गंगाजल चढ़ाते थे और छप्पर में बैठकर तीन-चार लड़कों को पढ़ाया करते थे।

चुंगी के पास कोहनी जैसा मोड़ था, बाई तरफ खरंजों की सड़क किले को जाती थी, दाई तरफ से आकर जो सड़क मिलती थी, वह कच्ची थी। उस कच्ची सड़क पर नालियों ने रास्ते बना लिए थे, जिनका पानी गंगाघाट की रेत में सूखता रहता। इसी कच्ची सड़क पर कई गलियां नालियों के साथ-साथ उतरती थींबहते पानी से कटी-फटी गलियां! यही गलियां बन्नो की गलियां थीं।

जहां बन्नो की गलियां खत्म होती थीं, वहां से पथरीली सड़क मिशन स्कूल तक जाती थी जो अंग्रेजों की पुरानी कोठी थी। यहीं पर थी मेहंदी की बाड़ और धतूरों का मैदान।

इस धतूरे के मैदान ने मुझे बड़ा दुख दिया था। जब बस्ती में मुझे और बन्नो को लेकर तनाव पैदा हो गया था तो एक बार बन्नो जैसे-तैसे चुंगी तक आयी और बोली थी”मौलवी साहब के साथ वाले अगर ज्यादा बदमाशी देंगे मंगल, तो मैं धतूरे खाकर सो जाऊंगी। तुम शहर छोड़कर मत जाना .तुमने शहर छोड़ा तो गंगाजी यहां हैं, सोच लेना…।”

ज्यादा बात नहीं हो पाई थी। वह चली गयी थी। मैं कुछ बता भी नहीं पाया था कि मेरे घर में क्या कोहराम मचा हुआ है, कि कैसे रोज बांजार में दादा जी को वे लोग धमकियां दे रहे थे जिन्हें वे पहचानते तक नहीं थे। सभी को डर था कि कहीं किसी दिन मेरी हत्या न कर दी जाए या रात-बिरात कहीं मुसलमान घर में न घुस पड़ें।

पाकिस्तान तो बन चुका था बन्नो, उसके बाद भी तुम्हारे अब्बा भरथरीनामा लिख रहे थे

माता जी पिछले तप से नृप बना, अब नृप से बनूं फकीर।

आंखिर वंक्त वंफात के, हर होंगे दिलगीर॥

तेरे अपनी खल्क सुपुर्द करी उनके सिर पर सर गरदान किया।

बर्बाद सब सल्तनत करी बन जोगी मुल्क वीरान किया।

लोग कहते थे ड्रिल मास्टर का दिमांग बिगड़ गया है जो भरथरी-नामा लिख रहे हैं। यह तुरक नहीं है, यहीं का कोई काछी-कहार है। तभी हमें पता चला था कि मुसलमान वही है जो ईरानी-तूरानी है, यहां का मुसलमान भी मुसलमान नहीं है…ड्रिल मास्टर साहब को सबने अलग-सा कर दिया था, पर उन्हीं की बन्नो की बात लेकर सब खड़े हो गये थे। जैसे वे ज्यादा बड़े सरपरस्त थे।

तुम्हें नहीं मालूम, पर मुझे मालूम है बन्नो, ड्रिल मास्टर साहब ने कुछ भी नहीं कहा था, इसके सिवा कि जो मौलवी साहब और बाकी लोग ठीक समझें, वही ठीक होगा। वे खुद कुछ सोच ही नहीं पा रहे थे। एक दिन छिपकर आये थे और दादाजी के पास रो पडे थे। उस दिन के बाद वे भरथरीनामा तो लिखते रहे थे पर किसी को सुनाने की हिम्मत नहीं करते थे। वे लिखते रहे, इसका पता मुझे वक्त मिला था जब घरवालों की घबराहट और खुद कुछ न समझे पाने, तय न कर पाने के कारण मैं शहर छोड़ रहा था और चुंगी वाले मुंशीजी ने मुझे चुपचाप विदाई देते-देते एक पुरजा मेरे पसीने से तर हाथ में थमा दिया था।

वह रात बहुत डरावनी थी। बस्ती पर काल मंडरा रहा था। सब दहशत के मारे हुए थे। पता नहीं कब क्या हो जाए। कब ‘या अली, या अली’ की आवांजें उठने लगें और खूनंखराबा हो जाए। गंगा भी उस दिन घहरा रही थी। तट का पीपल भी अशान्त था। बहुत तेज हवा थी। किला सायं-सायं कर रहा था और पांच-सात हिन्दुओं के साथ हां, कहना पड़ता है बन्नो, हिन्दुओं के साथदादा मुझे स्टेशन छोड़ने आ रहे थे ताकि मैं जिऊं-जागूं…कहीं भी परदेस में रहकर। पहले सोचा गया कि मामा के यहां जौनपुर चला जाऊं और वहां रेलवे वर्कशाप, कुर्ला, में काम कर रहे मौसा के पास रहूं वहीं नौकरी ढूंढ़ लूं।

कैसी थी वह रात, बन्नो ! और कितना बेइंज्जत होकर मैं निकल रहा था। दिमांग में हजारों हथौड़े बज रहे थे। एक मन करता था कि लौट पडूं, घर से गंडासा उठाऊं और तुम्हारे ‘उन मुसलमानों’ पर टूट पडूं। खून की होली खेलकर तुम्हें जीतूं और न जीत पाऊं तो तुम्हें भी मारकर गंगा में जल-समाधि ले लूं।

पर कहीं दहशत भी होता था और यह खयाल भी आता था कि ड्रिल मास्टर साहब ने तो कुछ भी नहीं कहा है। मुंखालंफत भी नहीं कि है…सिवा इसके कि वे चुप रह गये हैं, उन्हें भरथरीनामा लिखना है। अब लगता है कि वे भरथरीनामा न लिख रहे होते तो शायद इतना विरोध न होता…

शहर को साँप सूंघ गया था। दादा को बता दिया था कि अगली सुबह मेरी शक्ल न दिखाई दे। आधी रात तक सोचना-विचारना चलता रहा, फिर आखिरी गाड़ी रह गयी थी पार्सल, जो मुगलराय जाती थी।

हां, पांच-सात हिन्दुओं के साथ मुझे स्टेशन तक पहुंचाया गया। हम बांजार वाली सड़क से भी नहीं आये। किले वाले सुनसान रास्ते से स्टेशन की सड़क पकड़ी थी। मुंशी जी लालटेन लिए पक्की सड़क तक आये थे। और तभी वह पुरजा उन्होंने पसीजी हथेली में थमा दिया था। वहां तो रोशनी थी नहीं। स्टेशन पर सब साथ थे। पार्सल ढाई बजे रात को छूटी थी। दादा जी कितने परेशान-बेहाल थे। सब बहुत डरे हुए, अपमानित, और शायद इसीलिए बहुत खूंख्वार भी हो रहे थे। लग रहा था कि मुझे शहर से हटा देने के बाद दंगा जरूर होगा। अब ये लौटकर जाने वाले हिन्दू दंगा करेंगे। ढलती रात में ये सोते हुए मुसलमानों को चीर-फाड़ डालेंगे। हिन्दू का हिन्दू होना भी कितना तकलींफदेह हैं बन्नो…यह होते ही कुछ कीमती घट जाता है।

बहुत तकलींफदेह थी वह विदाई। उतरती रात की हवा में खुनकी थी और स्टेशन पर पत्थर का फर्श काफी ठंडा था। सामने विंध्या की पहाड़ियां और ताड़ के पेड़ चुपचाप खड़े थे।

अब तुम्हें क्या बताऊं…क्या कभी सोचा था कि इस तरह मेरा घर छूट जाएगा? अपने शहर से बेइज्जत होकर कोई कहीं भी चैन नहीं पाता। मुझे वे गलियां याद आ रही थीं जिनमें बन्नो आने की कोशिश करती थी। मैं चुंगी पर बैठकर कितनी प्रतीक्षा करता था और जहां मेहंदी के फूल पड़े दिखाई देते थे, समझ लेता था कि बन्नो यहां तक आ पायी है। आगे नहीं बढ़ पायी। किसीने देख लिया होगा, टोका होगा या रोका होगा।

सच कहता हूं तुमसे, उसी दिन से एक पाकिस्तान मेरे सीने में शमशीर की तरह उतर गया था। लोगों के नाम बदल या अधूरे रह गये थे। बस्ती में हवा का बहना बन्द हो गया था। और लगा था कि बन्नो घिर गयी है। शर्म, डर, गुस्सा, आंसू, खून, बदहवासी, पागलपन, प्यारक्या-क्या उबल-धधक रहा था मेरे भीतर। सच कहूं तो यह सब होने के बाद अगर बन्नो मिल भी जाती तो कुछ नहीं होता। जो होना था, हो चुका था।

पार्सल गाड़ी में बैठकर वह पुरजा पढ़ा था। तुम्हारे पास वही कहने को था जो मास्टर साहब के पास था। उसी पुरजे से पता चला कि मास्टर साहब भरथरीनामा लिखते जा रहे हैं

क्यों बनता दरवेश छोड़ दल लश्कर फौज रिसाले को।

क्यों बनखंड में रहता है तज गुल नरगिस गुललाले को॥

क्यों भगवा वेष बनाता है तज अतलस शाल दुशाले को।

क्यों दर-दर अलख जगाता है तज कामरु ढाके बंगाले को॥

क्यों हुआ सैदाई! छोड़ सब बादशाही॥

हां…सैदाई ही कह लो…अतलस शाल-दुशाले और नरगिस गुलेलालासब कुछ तो था सचमुच। नीम, आक, मेहंदी और धतूरे के फूल किस नरगिस से कम थे, बन्नो? पर उस पाकिस्तान का हम क्या करते?

गाड़ी चली आयी और मैं सचमुच दरवेश हो गया। फिर कभी घर लौटने का मोह नहीं हुआ।

मैं जानता था कि मास्टर साहब की सांस भी चुनार में घुट रही होगी। बन्नो की सांसों का कुछ पता नहीं था। बस, इतना-भर लगता था कि उसने गंगा में डूबकर जान नहीं दी होगी। वह होगी। रातों में किसी का बिस्तरा गर्म करती होगी। प्यार करती होगी। मार खाती होगी। जिनह को बर्दाश्त करती होगी। बीबी की तरह पूरी ईमानदारी से मन्नतें मानती होगी, मेहंदी रचाती होगी। बच्चों का गू-मूत करती होगी। सुखी होगी, पछताती होगी। सब भूल गयी होगी। जो नहीं भूल पायी होगीवह रुका हुआ वक्त उसका पाकिस्तान बन गया होगा। उसे सताने के लिए…

खैर बन्नो…जो हुआ सो हो गया। मैं मुगलसराय से इलाहाबाद आया और इलाहाबाद से बम्बई। कुर्ला की रेलवे वर्कशाप में मौसा ने कुछ काम दिला दिया। कुछ दिन वहीं गुजारे…फिर मै पूना चला गया। अस्पताल की लिंब फैक्टरी में, जहां लकड़ी के हाथ-पैर बनते हैं। मुझे मालूम था कि अब कोई भी चुनार नाम की जगह में जी नहीं पाएगा न मेरा घर, न तुम्हारा घर। पर यह पता नहीं था कि दादा इतनी दूर चले आएंगे और साथ में कई घरों को लेते आएंगे।

सच पूछो तो चुनार में रह ही क्या गया था? जब पाकिस्तान बन जाता है तो आदमी आधा रह जाता है। फसलें तबाह हो जाती हैं। गलियां सिकुड़ जाती हैं और आसमान कट-फट जाता है। बादल रीत जाते हैं और हवाएं नहीं चलतीं, वे कैद हो जाती हैं।

दादा के खत से मालूम हुआ था, कई वर्ष बाद, कि कुछ घर जुलाहों-बढ़ई के साथ लेकर वे फसलों, गलियों, आसमान, बादल और हवा की तलाश में निकल पड़े थे और भिवंडी आ गये थे। यह नहीं मालूम था कि बन्नो का घर भी साथ आया था। ड्रिल मास्टर क्या करते आकर? यह मैंने भी सोचा था। दादा का आना तो ठीक था। वे सूती कपड़े का व्यापार करते थे। आठ घर मुसलमान जुलाहों, दो घर हिन्दू बढ़इयों को लेकर वे भिवंडी आ गये थे। पता नहीं शुरू-शुरू में उन्हें क्या परेशानी हुई।

बन्नो, तुम्हारे बारे में मुझे तब पता चला जब दादा एक बार मुझसे पूना मिलने आये। तब बहुत मामूली तरह से उन्होंने बताया था कि ड्रिल मास्टर साहब का घर भी आया है। उन्हें भिवंडी स्कूल में जगह मिल गयी है और यह भी कि उन्होंने बन्नो की शादी कर दी है। दामाद वहीं उनके साथ वाले मुहल्ले में रहता है, करधे चलाता है। रेशम का बढ़िया कारीगर है।

जिस तरह दादा ने यह खबर दी थी, उससे लग रहा था कि वे जान-बूझकर इसे मामूली बना देने की कोशिश कर रहे थे।

लेकिन मुझे यह नहीं मालूम था बन्नो, कि बाजे मुहल्ले में दादा और तुम्हारा घर एक ही है कि ऊपर वे रहते हैं और तुम लोग नीचे। बाकी लोग बंगालपुरा और नई बस्ती में हैं। शायद मास्टर साहब पिछले पछतावे को भूल सकने के लिए ही ऐसा कर बैठे हों। मन तो बहुत हुआ कि जल्दी से जल्दी चलकर तुम्हें देख आऊं पर सच पूछो तो मन उखड़ा हुआ था। यह सब सुनकर और भी उखड़ गया था कि तुम भी वहीं हो और शादीशुदा हो। और फिर बातों-बातों में दादाजी ने घुमा-फिराकर यह भी कह दिया था कि मैं भिवंडी न आऊं तो बेहतर हैक्योंकि उन्हें मास्टर साहब का खयाल था। वे जानते थे कि मास्टर साहब ने कुछ नहीं किया था, और दादा जी उन्हें मेरी उपस्थिति से दु:खी या जलील नहीं करना चाहते थे। कितनी अजीब स्थिति थी यह…क्या यह नहीं हो सकता था कि घर ऐसा ही रहता और इसमें रहने को मुझे भी जगह मिलती?

मन में तरह-तरह के खयाल आते थे ,दबा हुआ गुस्सा कहीं फूट पड़ा तो?

अगर मेरे भीतर का धधकता हुआ पाकिस्तान फट पड़ा तो? अगर मैंने तुम्हारे आदमी को तुम्हारे साथ न सोने दिया तो? अगर भिवंडी से उसे भी मैं उसी तरह निकाल सका, जैसे, कि कभी मैं निकाला गया था, तो? किसी रात मैं बर्दाश्त न कर पाया और तुम्हारे कमरे में घुस पड़ा तो?

मुझे मालूम है, दादा और मास्टर साहबदोनों एक-दूसरे को अपने मासूम होने का भरोसा दे रहे थे। पर मेरे पास क्या भरोसा था? उनका क्या बिगड़ा था ! बिगड़ा तो मेरा था। मैं तभी से एक नकाब लगाये घूम रहा था। हाथों में दस्ताने पहने और कमर में खंजर दबाये।

लेकिन बन्नो, भिवंडी में भी दंगा हो गया। मेरी-तुम्हारी वजह से नहीं उसी एहसास की कमी की वजह से। सुना तो मैं सन्न रह गया। पता नहीं अब क्या हुआ होगा? पांच बरस पहले तो मैं वजह हो सकता था, पर अब तो मैं वहां नहीं था। गया तक नहीं था। इसी वजह से कि तुम दिखाई दोगी और मैं दंगा शुरू कर दूंगा।

पर तुम मुझे दिखाई दीं तो इस हालत में।

रात चांदनी थी और बन्नो नंगी थी

मैं जब भिवंडी पहुंचा तो दंगा खत्म हुए दस-बारह दिन हो चुके थे। घुसते ही बस्ती में जगह-जगह काले चकते दिखाई पड़ते थे। कुछ घर, फिर एक काला मैदान, फिर मकानों-घरों का एक सहमा हुआ झुंड और उसके बाद फिर एक काला मैदान। उड़ती हुई राख। आग और अंगारों की महक अब नहीं थी। पर राख की एक अलग महक होती है, बुझे हुए शोरे जैसी। कुछ तेंज खरैंदीजो नथुनों से होकर भीतर तक काट करती है।

सुनो, तुमने भी इस महक को जरूर महसूस किया होगा। ऐसा कौन है इस देश में जो राख की महक को न पहचानता हो। जब मैं एस. टी. स्टैंड (बस-अड्डे) पर उतरा, शाम हो रही थी। गश्ल से जो दहशत होता है वैसा कुछ नहीं था। वहां, जहां पर सिनेमा के पोस्टर लगे हुए हैं, दो-तीन पुलिसवाले बतियाते खड़े थे। बसें ंज्यादातर खाली थीं। वे चुपचाप खड़ी थीं। संगमनेर, अलीबाग, भीरवाड़ा या सिन्नर जानेवाली बसों की तो बात ही क्या, शिर्डी जाने वाला भी कोई नहीं था।

बस-अड्डे की टीन तले चार-पांच पुलिसवाले और दिखाई दिए, खानाबदोशों की तरह छोटी-सी गृहस्थी जमाये हुए। अगर उनकी बन्दूकें गन्नों के ढेर की तरह जमा न होतीं तो शायद यह भी नहीं मालूम पड़ता कि वे पुलिसवाले हैं।

दोनों सड़कें खाली थीं। डाकबंगले में जहां कलक्टर डेरा डाले पडे थे, कुछेक लोग चल-फिर रहे थे। थाना कल्याण जाने वाली टैक्सियां भी नहीं थीं।

दंगाग्रस्त इलाकों से गुजरना कैसा लगता है, शायद इसका भी अन्दांज तुम्हें हो, मुझे बहुत नहीं था। एक खास किस्म का सन्नाटा…या टपकन। वीरान रास्ते और साफ-साफ दिखाई देनेवाले खालीपन। कोई देखकर भी नहीं देखता। देखता है तो गौर से देखता है पर बिना किसी इनसानी रिश्ते के। यह क्यों हो जाता है? एहसास इतना क्यों मर जाता है? या कि भरोसा इतना ज्यादा टूट जाता है।

इतने छोटे-से कस्बे में बाजे मोहल्ले का पता पूछना भी दुश्वार हो गया। खैर, जैसे-तैसे मोहल्ला मिला। घर भी मिला पर उसमें सन्नाटा छाया हुआ था। हिन्दुओं ने यह क्या कर डाला थाक्या इतने सन्नाटे में कोई इनसान रह सकता है।

मुझे मालूम था बन्नो, ड्रिल मास्टर साहब, तुम्हारा शौहर मुनीर सब यहीं होंगे। मेरे घरवाले भी होंगे। पर ऊपर के खंड में अंधेरा था। चांदनी रात न होती तो मैं घबरा ही जाता।

सचमुच, एक क्षण के लिए लगा कि अगर मैंने चुनार न छोड़ दिया होता, तो उसकी भी यही दशा होती। फिर बन्नो, तुम्हारा खयाल आया। कैसे तुम्हारे सामने पडूंगा। सारा खौलता हुआ खून ठंडा पड़ गया था। मैं जैसे चुनार की उन्हीं गलियों में आ गया था उसी उम्र के साथ।

घर का दरवाजा खुला था। मैंने आहिस्ता से भीतर कदम रखा। एक आंगन-सा। आंगन के एक कोने में दो-एक घड़े रखे थे। उन्हीं के पास दो सुरमई छायाएं थीं। दोनों औरतें थी। एक औरत कमर तक नंगी थी। दूसरी उसी के पास बैठी बार-बार उसके गले तक हाथ ले जाती थी और नंगी छातियों से कमर तक लाती थी। पता नहीं क्या कर रही थी। पर एक औरत की नंगी पीठ दिखाई दे रही थी। वे दोनों औरतें वहां बैठी क्या कर रही थीं, मैं समझ नहीं पाया। सहमकर बाहर आ गया।

बाहर खड़ा था कि ड्रिल मास्टर साहब दिखाई दिये। उन्होंने एक मिनट बाद ही पहचान लिया। लेकिन उन्होंने आवभगत नहीं की। वे सोच ही नहीं पाये कि मुझे किस तरह लें! किस बरस के किस दिन से बात शुरू करें, किस रिश्ते से करें, कहां से करें। वे कुछ कहें इसके पहले ही मैंने उबार लिया, जैसे किसी अजनबी से मैंने पूछा हो, वैसे ही दादा जी के बारे में पूछ दिया।

”वो तो चुनार चले गये परसों!” मास्टर साहब ने कहा।

”परसों…” मैं और क्या कहता।

”हां, रुके नहीं। बहुत-से लोग वापस चले गये है।” वे बोले।

और मैं उसी क्षण समझ गया कि सब बातों के बावजूद दादाजी शायद फिर भी चुनार लौट सकते थे पर मास्टर साहब नहीं। मास्टर साहब के चुनार छोड़ने का सबब वह नहीं था, जो दादाजी का या मेरा रहा होगा। उनका यहां चले आना वक्त का दिया हुआ वनवास था। और वक्त के दिए हुए वनवास से लौट सकना आसान नहीं होता। मुझे तो सिर्फ कुछ लोगों ने वनवास दिया था।

घरवाले वहां नहीं थे, इसलिए कुछ कह भी नहीं पा रहा था। दंगा-ग्रस्त शहरकहां पनाह मिल सकती थी? मास्टर साहब अपने घर टिका लें, यह हो नहीं सकता था।

”सब सामान वगैरह भी ले गये है…”

”नहीं, ज्यादा सामान तो यहीं है…” वे बोले।

”ताला बन्द कर गये है?”

”हां, पर एक चाबी मेरे पास है।” उन्होंने मुझे सकुचाते हुए सहारा दिया।

”मैं एक दिन रुक/गा, वैसे भी कल शाम चला जाना है।” मैंने खामख्वाह कहा, क्योंकि कोई और चारा नहीं था। अजनबी बस्ती में रात पड़े मैं कहां जा सकताथा!

मुझे छोड़कर वे घर में घुस गये। एक मिनट बाद वे एक मोमबत्ती और चाबी लेकर आये और बगल के जीने से ऊपर चढ़ा ले गये। ताला खोलकर मुझे पकाड़ाते हुए बोले”खाना-वाना खाया है?”

”हां” मैंने कहा और भीतर चला गया।

”कुछ ंजरूरत हो तो बता देना…” वे बोले और नीचे चले गये। भरथरीनामा का शायर काफी समझदार था। ‘बता देना’! यह नहीं कि मांग लेना।

बन्नो, कितनी विचित्र थी वह रात! तुम्हें मालूम भी नहीं था कि ऊपर मैं ही हूं। मास्टर साहब ने बताया या नहीं बताया, क्या मालूम। कुछ भी कह दिया होगा। सुबह-सुबह पुलिस न आती तो तुम्हें जिन्दगी-भर पता न चलता कि रात छत पर मंडराने वाली छाया कौन थी।

चारों तरफ सन्नाटा…सन्नाटा…

रात चांदनी थी। हवा बन्द थी। मैं सांस लेने या शायद बन्नो को देख सकने के लिए खुली छत पर खाट डालकर लेट गया था। कुछ देर आहट लेता रहा। शायद कोई आहट तुम्हारी हो बन्नो…पर फिर मन डूब गया। चाहे कितनी गर्मी हो पर औरत को तो आदमी के साथ ही लेटना पड़ता है।

पिछवाड़े वाला पीपल चांदनी में नहाया हुआ था। मैंने खाट ऐसी जगह डाल ली थी, जहां से आंगन में देख सकूं…पर जो कुछ देखा वह बहुत भयावना था।

दो खाटें आंगन में पड़ी थीं। एक पर अम्मी थी, दूसरी पर बन्नो! कितना अजीब लगा था बन्नो को लेटा हुआ देखकर…

चांदनी भर रही थी और बन्नो अपना ब्लाउज खोले, धोती कमर तक सरकाए नंगी पड़ी थी। उसकी नंगी छातियां पानी भरे गुब्बारे की तरह मचल रही थीं और वह अधमरी मछली की तरह आहिस्ता-आहिस्ता बिछल रही थी।

”आये अल्ला…” यह बन्नो की आवांज थी।

”सो जा, सो जा !” अम्मी बोली थी।

”ये फटे जा रहे हैं…” बन्नो ने कहा और उसने अपनी दोनों छातियां कसकर दबा ली थीं जैसे उन्हें निचोड़ रही हो।

अम्मी उठकर बैठ गयीं”ला, मैं सूंत दूं!” कहते हुए उन्होंने बन्नो की भरी छातियों को सूतना शुरू कर दिया था। दूध की छोटी-छोटी फुहारें बन्नो की छातियों से झर रही थी और वह हल्के-हल्के कराहती और सिसकारती थी। दूध की टूटी-टूटी फुहार, जैसे इत्र के फव्वारे में कुछ अटक गया हो। फिर दस-बीस बूंदें एकाएक भलभलाकर टपक पड़ती थीं। दो-चार बूंदें उसके पेट की सलवटों में समाकर पारे की तरह चमकती थीं। उसकी नाभि में भरा दूध बड़े मोती की तरह जगमगा रहा था।

अम्मी उसकी छातियों का दूध अपनी ओढ़नी के कोने से सुखाती और चार-छ: बार के बाद वहीं किनारे की पाली में कोना निचोड़ देती थी। मटमैली नाली में पनीले का दूध का पतला सांप कुछ दूर सरककर कहीं घुस जाता था।

ओह बन्नो! यह मैंने क्या देखा था? मैं दहशत के मारे सन्न रह गया था। सारा बदन पसीने से तर था। सिसकारियां और कराहटें और आसमान में लटकते दो डबडबाये स्तन! कुछ दहशत, कुछ उलझन, कुछ बेहद गलत देख लेने को गहरा पछतावा…।

बहुत रात गये मैं छत पर टहलता रहा। जब नीचे शान्ति हो गयी और मैंने देख लिया कि बन्नो धोती का पल्ला छाती पर डालकर लेट गयी है, तब मैं भी लेट गया। यह कैसा दृश्य था? आसमान में जगह-जगह दूध-भरी छातियां लटकी हुई थीं…इधर-उधर…।

आंख लगी ही थी कि एकाएक पिछवाडे ख़ड़खड़ाहट हुई। कोई रो रहा था और नाक पोंछते हुए कह रहा था”कादिर मियां! बन गया साला पाकिस्तान ! भैयन, अब बन गया पूरा पाकिस्तान…।”

फिर रोना रुक गया था। कुछ देर बाद वही आवांज फिर आयी थी”कादिर मियां, अब यहीं इहराम बांधेंगे और तलबिया कहेंगे! अपना हज्ज तो हो गया, समझे कादिर मियां!”

अगर पिछवाड़े पीपल न होता तो शायद पाताल से आती यह आवांज सुनकर मैं भाग जाता। पर अब तो खुली आंखों को तरह-तरह के दृश्य दिखाई दे रहे थेआसमान से गिरता खून, अंधेरे में भागती हुई लाशें, बीच बांजार खड़े हुए धड़ और कटी गर्दनों से फूटते हुए फव्वारे। लपटों में नंगे नाचते हुए लोग…।

पीपल न खड़खड़ाता तो मैं बहुत डर जाता। उसके पत्तों की आवांज ऐसे आ रही थी जैसे अस्पताल के दफ्तर में बैठे हुए टाइप बाबू अपनी मशीन पर कुछ छाप रहे हों…बस यही आवांज जानी-पहचानी थी। बाकी सब बहुत भयानक था।

सुबह माथा बेतरह भारी था। आंखों में जलन थी। हाथ-पैर सुन्न थे। उठना पड़ा, क्योंकि पुलिस आयी थी। मास्टर साहब ने आकर जगाया था। वे डरे हुए थे। बोले”पुलिस तुम्हें पूछ रही है…।”

”क्यों?”

”बाहरवाले की तहकीकात करती है। हमसे पूछ रहे थे रात कौन आया है, कहां से आया है, क्यों आया है?”

सुनते ही मेरे आग लग गयी थी। तुम्हीं बताओ, जब मैं घर से उस अंधेरी रात में निकला या निकाला गया था तो कोई पूछने आया था कि इस रात में कौन जा रहा है, कहां जा रहा है, क्यों जा रहा है?”

पूरे आदमी को न समझना, सिर्फ उसके एक वक्ती हिस्से को समझना ही तो पाकिस्तान है बन्नो! जब पुलिस मुझे सुबह-सुबह जगाकर थाने ले गयी तो मैं समझ गया कि अब हम और तुम दोनों पाकिस्तान में घिर गये है…पर यह घिर जाना कितना दु:खद था!

थाने पर मेरी तहकीकात हुई। मैं यहां क्यों आया हूं? क्या बताता मैं उन्हें? आदमी कहीं क्यों आता-जाता है? पुलिस वाले मुझे बहुत परेशान करते अगर मास्टर साहब वहां खुद न पहुंच गये होते। उन्होंने ही सारी तंफसील दी थी। उस वक्त उनका मुसलमान होना कारगर साबित हुआ था। पर मुझे लग रहा था कि उस मौजूदा माहौल में मास्टर साहब फिर तो वही गलती नहीं कर रहे थे जो उन्होंने भरथरीनामा शुरू करके की थी।

थाने में सवालों के जवाब देना आसान भी था और टेढ़ा भी। आखिर वहां से निकलकर हम सामने पड़े कटी लकड़ियों के ढ़ेर पर बैठ गये थे। मास्टर साहब चाहते थे कि मैं होश-हवास में आ जाऊं, क्योंकि मेरा रंग फक हो गया था।

वहीं तीन बत्ती के पास दो-तीन लोग और बैठे थे। शायद किसीकी जमानत या तफतीश के लिए आये थे। उनके चेहरे लटके हुए और ंगमंजदा थे। मौलाना की आंखों में खौंफ था। वे साथ बैठे लोगों को बता रहे थे”रसूल ने कहा है कि सूर तीन बार फूंका जाएगा। पहली बार फूंकेंगे तो लोग घबरा जाएंगे, सब पर खौंफ बरपा हो जाएगा। दूसरी बार जब सूर में फूंक मारी जाएंगी तो सब मर जाएंगे। तीसरी आवांज पर लोग जी उठेंगे और अपने रब के सामने पेश होने के लिए निकल आएंगे…यही होना है…सूर में अभी पहली बार फू/क मारी गयी।”

”भरथरीनामा लिख रहे है?” मैंने पूछा।

”हां…भरमता मन मेरा, आज यहां रैन बसेरा!

कहो बात जल्द कटे रात, जल्द हो फंजर सबेरा!!…

कहते-कहते मास्टर साहब उधर देखने लगे जहां छत की सूनी मुंडेरों पर घास के पीले फूल खिले थे। घनी घास में से अबाबीलें छोटी मछलियों की तरह उछलती थीं। घास की टहनी से पीले फूल चोंच से तोड़कर उड़ती थीं। चोंच से फूल गिर जाते थे तो उड़ते-उड़ते फिर तोड़ती थीं…अबाबीलों का उड़ते-उड़ते या घनी घास में से उछलकर फूलों तक आना, पीले फूलों का तोड़ना, चकराते हुए फूलों का गिरना और अबाबीलों का दूर आसमान से फिर लौटकर आना…।

मास्टर साहब खामोशी से यही देख रहे थे। आखिर मैंने उन्हें टोका”कल रात…।”

”हां, वह बदरू है…पगला गया है। उसके चालीस करधे थे, जलकर राख हो गये। पिछवाड़े पीपल के नीचे ही तब से बैठा है। रात-भर रोता है। गालियां बकता है…” मास्टर साहब बोले।

”घर में कुछ…” मैंने बहुत हिम्मत करके कहा तो जोगी की तरह मास्टर साहब सब बता गये, ”हां…बन्नो को तकलीफ हैं। दंगे से तीन दिन पहले बच्चा हुआ था। डॉ. सारंग के जच्चा-बच्चा घर में थी। दंगाइयों ने वहां भी आग लगा दी। रास्ता रुंध गया तो जान बचाने के लिए दूसरी मंजिल से जच्चाओं को फेंका गया। बच्चों को फेंका गया। नौ जच्चा थीं। दो मर गयी। पांच बच्चे मर गये। बन्नो का बच्चा भी गली में गिरकर मर गया। उस वक्त मारकाट मची हुई थी। सवेरे हम बन्नो को जैसे-तैसे ले आये। अब उसके दूध उतरता है तो तकलीफ होती है…।”

कुछ देर खामोशी रही। अबाबीलें घास के फूल तोड़ रही थीं। उठने का बहाना खोजते हुए मैंने कहा, ”सोचता हूं, दोपहर ही पूना चला जाऊं…।”

”जा सको तो चुनार चले जाओ। अपने दादा को देख आओ…” मास्टर साहब बोले।

”क्यों, उन्हें कुछ हो गया है क्या?”

”हां…उनकी एक बांह कट गयी है। घर के सामने ही मारकाट हुई।

वे न होते तो शायद हम लोग जिन्दा भी न बचते। हमला तो हम पर हुआ था। वे गली में उतर गये। तभी बांह पर वार हुआ। बायीं बांह कटकर अलग गिर पड़ी। लेकिन उनकी हिम्मत…अपनी ही कटी बा/ह को जमीन से उठाकर वे लड़ते रहे…खून की पिचकारी छूट रही थी। कटी बांह ही उनका हथियार थी…दंगाई तब आग के गोले फेंककर भाग गये। गली में उनकी बांह के चिथड़े पड़े थे। जब उठाया तो बेहोश थे। दाहिने हाथ में कटी बांह की कलाई तब भी जकड़ी हुई थी…पर उस खुदा का लाख-लाख शुक्र। थाना अस्पताल में मरहम-पट्टी हुई। आठ दिन बाद लौटे। दूसरे ही दिन चुनार चले गये…।”

”तो उनकी बांह का क्या हाल था?…” मैं सुनकर सन्न रह गया था।

”ठीक था। चल-फिर सकते थे। कहते थे वहीं चुनार अस्पताल में यही करवाते रहेंगे। या खुदा…रहमकर…बेहतर हो देख आओ…” मास्टर साहब ने कहा और अपने आंखें हथेलियों से ढांप लीं।

मेरी चेतना बुझ-सी रही थी। मैं किस जहान में था? ये लोग कौन थे, जिनके बीच मैं था? क्या ये जो कुछ लोग आदमियों की तरह दिखाई पड़ते थेसच थे या कोई खौफनाक सपना? अब तो कटा-फटा आदमी ही सच लगता था। पूरे शरीर का आदमी देखकर दहशत होती थी।

…मैं फिर आकर कमरे में लेट गया था। मास्टर साहब भीतर चले गये थे। तभी नीचे से कुछ आवांजें आयी थीं। अम्मी…मास्टर साहब, बन्नो का आदमी मुनीर और बन्नो सभी थे। मुनीर कह रहा था, ”यहां रहने की जिद समझ में नहीं आती…”

”तुम्हारी समझ में नहीं आएगी।” यह आवांज बन्नो की थी, ”हम तो पहले इसी धरती से अपना बच्चा लेंगे, जिसने खोया है। फिर जब जगह चले जाएंगे। जहां कहोगे…”

मैंने झांककर देखा। दुबला-पतला मुनीर गुस्से से कांप रहा था। चीखकर बोला, ”तो ले अपना बच्चा यहीं से…जिसने मन आए, ले।”

मैं सकते में आ गयाकहीं कुछ…कहीं इसमें मेरा जिक्र तो नहीं था…पर शायद में गलत समझा था। बन्नो भी बिफरकर बोली थी, ”तू अब क्या देगा बच्चा मुझे…। अपना खून बेच-बेचकर शराब पीने से फुर्सत है?…”

तड़ाक!…शायद मुनीर ने बन्नो को मारा था। छोटा-सा कोहराम मच गया था।

बाद में बन्नो मुनीर को कोसती रही थी, ”मुझे मालूम नहीं है क्या? जितनी बार बम्बई जाता है, खून बेचकर आता है। फिर रात-भर पड़ा कांपता रहता है…”

यह सब मैं क्या सुन रहा था, बन्नो! तेरे भीतर भी एक और पाकिस्तान रो रहा था। सभी तो अपने-अपने पाकिस्तान लिये हुए तड़प रहे हैं। आधे और अधूरे, कटे-फटे, अंग-भंग।

ओफ्फ ! कितना अंधेरा था उस चांदनी रात में…जब मैं भिवंडी से उसी तरह चला जैसे एक दिन चुनार से चला था। अड्डे से एक टैक्सी थाना जा रही थी। उसी में बैठ लिया था। जब तक बस्ती रही, काले मैदान भी बीच-बीच में नंजर आते रहे। राख की तेंज महक भीतर तक उतरती रही। आसमान में डबडबाए स्तन लटकते रहे। चौराहों पर खड़े मुंडहीन धड़ों से खून के फव्वारे छूटते रहे!

थाना! थाना से बस पकड़कर बम्बई। बम्बई से गाड़ी पकड़कर पूना और पूना में फिर कई दिन बुखार से तपता पड़ा रहा।

मैं सब कुछ भूल जाना चाहता था बन्नो…सिर्फ अपने में सिमट आना चाहता था। उम्र का यह संफर कितना बेहूदा है कि आदमी कटता-फटता जाता है। लहू-लुहान होकर चलता जाता है।

और ऐसे अकेलेपन में अगर कोई यह आवांज सुने कि ‘और है कोई?’ तो क्या बीत सकती है, इसका अन्दांज किसी को नहीं हो सकता। तुम्हें भी नहीं बन्नो!…

और है कोई?

चार या पांच महीने हो गये थे। दादाजी का ंखत मिल गया था कि वे फिर भिवण्डी लौट आए हैं। सिंधियों और मारवाड़ियों के कारण माल ंज्यादा नहीं मिल पाता इसलिए बांजार मन्दा है। सब करघे चल भी नहीं रहे हैं। एक बांह न रहने के कारण बदन का पासंग बिगड़ गया है। मजाक में उन्होंने यह भी लिखा था कि उनका नाम ‘टोंटा’ पड़ गया है।

बाकी कोई खबर उन्होंने नहीं दी थी सिवा इसके कि मुनीर बन्नो को लेकर बम्बई चला गया है। पता नहीं वे लोग बम्बई में है या पाकिस्तान चले गये। ड्रिल मास्टर नीम-पागल हो गये हैं। घर में ड्रिल करते हैं, स्कूल में कोई पोथी लिखतेरहतेहैं।

…उस दिन मैं बम्बई न आता तो तुमसे मुलाकात भी न होती, बन्नो ! और कितनी तकलींफदेह थी वह मुलाकात। बाद में मैं पछताता रहा कि काश, मैं ही होता उसकी जगह। तुमने भी क्या सोच होगा कि मैं यही सब करता हूं? पर सच कहूं बन्नो, करता तो मैं भी रहा हूं पर तुम्हारे साथ नहीं। शायद तुम्हारे कारण करता रहा हूं।

पूना का दोस्त नहीं था वह। वहीं बम्बई का था। उसका नाम केदार है। कुछ दिन पूना में साथ रहा था, तभी दोस्ती हुई। मैं भिवंडी जाने के लिए बम्बई आया था। बम्बई उतरकर मन उखड़ भी गया था कि क्या करूंगा वहां जाकर।

उस शाम से तुम्हारा कोई लेना-देना नहीं है बन्नो! वह शाम मैं और केदार साथ गुजारना चाहते थे। कुलावा के एक शराब घर में हमने थोड़ी-सी पी थी। फिर वहां से टहलते हुए हैंडलूम हाउस तक आये थे।

उसी के पास कोई गली थी। अब जाऊं तो पहचान तो लूंगा पर यों याद नहीं है। केदार और मैं दोनों उसी में चले गये। शायद आगे चलकर दाहिने को मुड़े थे। वहीं पर एक सिगरेटवाले की दुकान थी। नीचे कारें खड़ी थीं। लगता था वोहरा मुसलमानों की बस्ती है। बहुत शान्त, साफ-सुथरी।

उस बिल्डिग में लिफ्ट था। यों सीढ़ियां भी बहुत साफ-सुथरी थीं। केदार के साथ मैं सीढ़ियों से ही ऊपर गया था। पांच मंजिल तक चढ़ते-चढ़ते मेरी सांस फूल आयी थी। उस वक्त घरों की खिड़कियों से खाना बनाने की गन्ध आ रही थी। छठी मंजिल एकदम वीरान थी। जिस फ्लैट की घण्टी केदार ने बजायी थी वह उतना साफ-सुथरा नहीं लगा रहा था।

दरवांजा खुला और हम हिप्पो की तरह हांफते हुए एक सिंधी के सामने खड़े थे। वह हमें उस कमरे में ले गया जिसमें मामूली तरह के सोफे लगे हुए थे। वह सिंधी अब भी हांफ रहा था। लगता था ज्यादा बात करेगा तो अभी उसकी सांस उखड़ जाएगी और फिर कभी लौटकर नहीं आयेगी।

मुझे उलझन हो रही थी। मैं खुली हवा में सांस लेने के लिए खिड़की के पास खड़ा हो गया था। दूर-दूर तक गन्दी छतें नंजर आ रही थीं। तरह-तरह के आकारों की। मेरे बारे में केदार ने बता दिया था कि मैं वहीं सोफे पर बैठूंगा और इन्तंजार करूंगा। उस हांफते सिंधी ने कोकाकोला की एक बोतल मंगवाकर मेरे लिए रख दी और केदार को लेकर अपनी मेज के पास चला गया। वहां वह केदार को एक गुंजला हुआ काला बुर्का दिखा रहा था। कह क्या रहा था, यह वहां से सुनाई नहींपड़ा।

उसके बाद वे दोनों कहां गुम हो गये, कुछ पता नहीं चला। दो-एक मिनट बाद केदार के हंसने की आवांज बगल से आयी थी।

फिर केदार तो नहीं आया, वह सिंधी उसी तरह हांफता हुआ आया और जोर-जोर से सांस छोड़ता हुआ बोला, ”बिअर…” बाकी शब्द उसके हांफने से ही साफ हो रहे थे”पिएंगे, मंगवाऊं?”

”पी लूंगा…” मैंने कहा तो उसने लड़की को हांफकर दिखाया और वह बीयर ले आया। सिंधी ने नहीं पी। मैं ही बैठा पीता रहा।

”आप…” वह उसी तरह हांफ रहा था, ”बम्बई…” मतलब था”नहीं रहते…”

”नहीं, पूना रहता हूं।” मैंने कहा।

”घूमने…” वह फिर हांफा।

”काम से आया था…” मैंने उसे बता दिया।

”बिजनेस…” हांफना बदस्तूर था।

”नहीं पर्सनल काम था। भिवंडी जाऊंगा।”

फिर वह बैठा-बैठा तब तक हांफता रहा जब तक केदार सामने आकर नहीं खड़ा हुआ। उसे देखते ही सिंधी हड़बड़ाकर उठ खड़ा हुआ। मुझे भी उलझन हो रही थी। मैं गिलास खत्म करके फौरन केदार के पास आ गया। हम तीनों बीच वाले बड़े कमरे में आ गये थे। केदार मेरी बीयर के पैसे दे ही रहा था कि बगल का दरवांजा खुला। मैंने इतना ही देखा कि एक औरत के हाथ ने केदार को उसका कन्घा और चाबियों का गुच्छा दिया और उस हाँफते हुए सिंधी के साथ मुझे खड़ा देखकर पूछा”और है कोई?”

मैंने पलटकर देखादरवाजे की चौखट पर हाथ रखे पेटीकोट और ब्लाउज पहने तुम खड़ी थीं बन्नो! और पूछ रही थीं’और है कोई?’

हां! कोई…कोई और भी था।

एक थरथराते अन्धे क्षण के बाद तुमने भी पहचान लिया था और तब कैसी टेढ़ी मुस्काराहट आयी थी, तुम्हारे होठों पर…जहर बुझी मुस्कारहट। या वही घोर तिरस्कार की मुस्कराहट थी? या सहज…कुछ भी नहीं मालूम।

पता नहीं यह बदला तुम मुझसे ले रही थीं, अपने से, मुनीर से या पाकिस्तानसे? मैं सीढ़ियां उतर आया था। आगे-आगे मैं था, पीछे-पीछे केदार। मन हुआ था सीढ़ियां? चढ़ जाऊं और तुमसे पूछूं”बन्नो! क्या यही होना था? मेरा हश्र यही होना था?”

अब कौन-सा शहर है जिसे छोड़कर मैं भाग जाऊं? कहां-कहां भागता रहूं जहां पाकिस्तान न हो। जहां मैं पूरा होकर अपनी तमाम हसरतों और एहसासों को लेकर जी सकूं।

बन्नो! हर जगह पाकिस्तान है जो मुझे-तुम्हें आहत करता है, पीटता है। लगातार पीटता और जलील करता चला जा रहा है।

मजदूर के जूते

                          मजदूर के जूते

एक बार एक शिक्षक संपन्न परिवार से सम्बन्ध रखने वाले एक युवा शिष्य के साथ कहीं टहलने निकले । उन्होंने देखा की रास्ते में पुराने हो चुके एक जोड़ी जूते उतरे पड़े हैं , जो संभवतः पास के खेत में काम कर रहे गरीब मजदूर के थे जो अब अपना काम ख़त्म कर घर वापस जाने की तयारी कर रहा था ।
शिष्य को मजाक सूझा उसने शिक्षक से कहा , “ गुरु जी क्यों न हम ये जूते कहीं छिपा कर झाड़ियों के पीछे छिप जाएं ; जब वो मजदूर इन्हें यहाँ नहीं पाकर घबराएगा तो बड़ा मजा आएगा !!”
शिक्षक गंभीरता से बोले , “ किसी गरीब के साथ इस तरह का भद्दा मजाक करना ठीक नहीं है । क्यों ना हम इन जूतों में कुछ सिक्के डाल दें और छिप कर देखें की इसका मजदूर पर क्या प्रभाव पड़ता है !!”
शिष्य ने ऐसा ही किया और दोनों पास की झाड़ियों में छुप गए ।
मजदूर जल्द ही अपना काम ख़त्म कर जूतों की जगह पर आ गया । उसने जैसे ही एक पैर जूते में डाले उसे किसी कठोर चीज का आभास हुआ , उसने जल्दी  से जूते हाथ में लिए और देखा की अन्दर कुछ सिक्के पड़े थे , उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और वो सिक्के हाथ में लेकर बड़े गौर से उन्हें पलट -पलट कर देखने लगा।
फिर उसने इधर -उधर देखने लगा , दूर -दूर तक कोई नज़र नहीं आया तो उसने सिक्के अपनी जेब में डाल लिए . अब उसने दूसरा जूता उठाया , उसमे भी सिक्के पड़े थे …मजदूर भावविभोर हो गया , उसकी आँखों में आंसू आ गए , उसने हाथ जोड़ ऊपर देखते हुए कहा –

“हे भगवान् , समय पर प्राप्त इस सहायता के लिए उस अनजान सहायक का लाख -लाख धन्यवाद , उसकी सहायता और दयालुता के कारण आज मेरी बीमार पत्नी को दवा और भूखें बच्चों को रोटी मिल सकेगी.”
मजदूर की बातें सुन शिष्य की आँखें भर आयीं . शिक्षक ने शिष्य से कहा – “ क्या तुम्हारी मजाक वाली बात की अपेक्षा जूते में सिक्का डालने से तुम्हे कम ख़ुशी मिली ?”
शिष्य बोला , “ आपने आज मुझे जो पाठ पढाया है , उसे मैं जीवन भर नहीं भूलूंगा . आज मैं उन शब्दों का मतलब समझ गया हूँ जिन्हें मैं पहले कभी नहीं समझ पाया था कि लेने  की अपेक्षा देना कहीं अधिक आनंददायी है देने का आनंद असीम है देना देवत्त है ।”

दोस्तों, सचमुच Joy of Giving से बढ़कर और कोई सुख नहीं है! हमें इस कहानी से सिक्षा लेते हुए अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार ज़रूर कुछ न कुछ दान देना चाहिए और ज़रुरत मंदों की हर संभव मदद करनी चाहिए!


ये कैसा प्यार

​जुदाई का ग़म उन्हें ही होता है, जिनको किसी के जाने का ग़म होता है| कहने का भाव जुदाई का गम उन्हें सबसे ज्यादा होता जिसका अपना कोई जिसे वो जी जान से प्यार करता है वो बिछड़ जाता है| ऐसा भी देखने को मिला है की जिनकी याद में, जुदाई के ग़म में हम अपनी ज़िंदगी व्यतीत कर रहे है उनको तो हमारी चिंता भी नहीं होती और वो कभी मुड़ के भी हमारी तरफ़ नहीं देखते| ऐसे प्यार करने को एक तरफ़ा प्यार कहते हैं|

 मैंने भी अपनी ज़िंंदगी में ऐसे प्यार करने वालो को देखा है| उनमें से एक है पंकज जो की एक लड़की से बहुत प्यार करता था जिसका नाम था सपना|  पंकज बचपन से ही उसको पसंद करता था| पंकज जिस रास्ते से अपने एक दोस्त अंकित के साथ स्कूल जाता था सपना का घर रास्ते में पड़ता था| वो रोज उसको जाते वक़्त देखता था | ऐसा करते करते उसको उस लड़की से प्यार हो गया जिसको सिर्फ़ वो दूर से देखता था| यह जाने बिना कि वो लड़की भी उसे चाहती है या नहीं| अब कई साल बीत चुके थे| एक दिन पंकज रोज़ की तरह स्कूल जा रहा था उसके मन में सपना को देखने की चाह वैसे ही बरकरार थी जैसे पिछले कई सालो से चल रहा था फिर अचानक जब वो सपना के घर के पास पहुँचता है तो क्या देखता है की इस बार वो दिखाई नहीं देती और उसके घर को ताला लगा हुआ था| पंकज अब हक्का-बक्का रह गया कि घर पर ताला क्यों लगा हुआ है| अब वो सपना को कैसे देखेगा वो आस पास से पूछता है और उससे पता चलता है कि वो यहाँ से घर छोड़ कर चले गए हैं और किसी को बता कर नहीं गए कि कहा जा रहे हैं| इस तरह पंकज का सपना जो सपना के साथ जिंदगी बिताने का था वो टूट जाता है|

 अब पंकज सपना की याद में स्कूल तो जाता है पर रास्ते में कभी भी फिर उसको सपना दिखाई नहीं देती| अब वो सपना की याद में अपनी पूरी ज़िंदगी बिताएगा ऐसा वो प्रण ले लेता है| अब पंकज पहले की तरह ख़ुश नहीं रहता था सपना के गम में हमेशा उदास रहता था जैसे की ज़िंदगी का अब कोई मकसद ही न रह गया हो | पंकज ने अपनी जिंदगी को जीना छोड़ दिया था| पंकज के दोस्त अंकित को सब कुछ पता था कि पंकज क्यों उदास है और अगर पंकज ज्यादा दिन ऐसे रहेगा तो वो ज्यादा देर तक जी नहीं पायेगा| अंकित जो की पंकज का दोस्त था इसलिए उसने अपने दोस्त को बचाने और उसकी ज़िंदगी में ख़ुशी लाने के लिए क़सम खाता है| अब वो रोज कुछ समय पंकज से मिलने को निकालता था और हमेशा पंकज को समझाता था की प्यार करना कोई गलत नहीं है और सपना से प्यार करके तूने कोई गलती नहीं की पर एक गलती तूने ज़रुर की कि सपना को इसके बारे में बताया नहीं | अगर बता देता तो शायद आज तुझे पता होता कि वो भी तुझसे प्यार करती थी कि नहीं | अगर करती होती तो तुझे आज पता होता के वो कहाँ है| मैं तेरे प्यार को गलत नहीं ठहराता पर यह तेरा प्यार एक तरफ़ा प्यार है ऐसा करने से न तो तुम्हे ख़ुशी मिलेगी और कहीं न कहीं सपना की ज़िंदगी भी खुशहाल नहीं होगी क्योंकि तुम उससे याद करते रहोगे और अनजाने में सही जब कोई किसी को दिल से याद करता रहता है तो कहीं न कहीं जिसे हम याद करते है वो भी बेचैन रहता है इस लिए कहीं न कहीं तू सपना को दुःख दे रहा है जो की तुम्हे नहीं करना चाहिए|

 यह बात अंकित बहुत प्यार से पंकज को समझाता है| अंकित की यह बात सुनकर पंकज एक दम उस की तरफ देखता है और बहुत ध्यान से सोचता है अंकित की यह बात उसके दिल में घर कर जाती है कि उसकी वजह से सपना को तकलीफ हो रही होगी| चाहे अनजाने में ही सही पर वो उसे दुःख दे रहा है| पंकज को बात समझ आ जाती है और वो अंकित को यक़ीन दिलाता है कि अबसे वो सपना को दिल में ज़रुर रखूँगा पर अपनी जिंदगी ख़ुशी-ख़ुशी से जिऊँगा| यह सुन कर अंकित उसको गले से लगा लेता है और कहता है मेरी कोशिश काम आ गयी मेरा दोस्त वापिस मुझे मिल गया|

  अगर आप किसी से प्यार करते हो तो उससे बोल दो मतलब इज़हार कर दो| उससे आपको पता चल जाएगा कि वो भी आपसे प्यार करता है या नहीं और अगर आपका कोई भी मित्र किसी तकलीफ़ में है तो उससे छोड़ने की बजाय उसे प्यार से समझाऐं| आपके इस तरह करने से अगर किसी एक को भी समझ आ जाए तो उसकी ज़िंदगी ग़म से ख़ुशी की ओर चली जाऐगी और जो ज़िंदगी उसे मिली है उसको वो ख़ुशी-ख़ुशी से जी पाऐगा|