एक कहानी बेबशी

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दिन भर खेतो में काम करके शरीर टूट जाता हैं ऐसा लगता है मानो शरीर को किसी ने गीले कपड़ो की तरह निचोड़ दिया हो। एक तो ये खेती का काम ऊपर से गरीबी का हाल क्या बताऊँ जितनी भी मेहनत कर लूँ खून पसीना बहा ले दो वक़्त की रोटी भी ठीक से नही मिल पाती। गरीबी में इन बच्चों को कैसे पाले कुछ समझ में नही आता हैं । घरवाली बोलती रहती है सारा दिन शहर जा के कोनों काम करो इ खेती से बीबी बच्चो का पेट नही पलने वालाअब करे तो का करे इस गरीबी ने तो जीना ही दुभर कर रखा है।

लाला से कर्जा ले के पैसा खेती में तो लगा दिए है पर बहुत मुश्किल लग रहा है इस बार कर्जा चुकाना। पिछले साल का पैसा भी थोड़ा बाकि है ऊपर से इतना सारा ब्याज़ ऐसा लगता है मानो किसी ने सिर के ऊपर बहुत बड़ा चट्टान ला के जबर्दस्ती रख दिया हो। लाला के पैसे से ही तो पिछले पाँच सालो से घर चल रहा हैं, लाला भी तो ठीक आदमी नही है जब भी ब्याज़ देने में देरी होती है तो अपने पहलवानों को ले आ धमकाता हैं, फिर उसे घर में रखा जो भी सामान मिलता है उठा के ले जाता है और मै मूक दर्शक की तरह ये तमाशा देखते रहता हूँ, पहली बार जब लाला आया था तो मैंने उसे रोकने की हिम्मत भी की थी लेकिन लाला भी बहुत जालिम और ज़लील इंसान हैं उसे बस अपने पैसे से मतलब हैं चाहे वो कैसे भी आये उससे उसे कोई भी फर्क नही पड़ता हैं। 

अब जब भी लाला आता है तो मुझे पहले दिन की बात याद आ जाती है जब उसने अपने पहलवानों से मुझे पिटवा दिया पैसे भी ले गया और घर का थोड़ा सामान भी गया। मै लाला के आगे हाथ जोड़े कुछ समय की मौहलत मांग रहा था तो उसने अपने सबसे तगड़े पहलवान को इशारे से कहाँ की मुझे पिट दे उसने भी इशारा पाते ही मुझ पर ऐसे टूट पड़ा मानों की मै कोई बकरी का बच्चा हूँ और वो शेर। वो मुझ पर हमला करने को जैसे ही आगे बढ़ा मैंने उसे देख लिया और मै लाला से दूर हो गया। कलुवा नाम था उस पहलवान का शरीर से भी पूरा कोयले जैसा ही रंग था उसका। दस गाँव में उसके जैसा कोई भी पहलवान ना था। सब डरते थे उससे , उसे मेरी ओर आते देख मेरे तो प्राण ही सूख गए मुझे मेरी मौत मेरे सामने से आते दिख रहा था। मैंने एक बार देखा था कलुवा को किसी को पीटते हुए बड़ी बेरहमी से मरता है पूरा का पूरा जल्लाद है ।

इतना ताक़तवर हैं फिर भी ना जाने क्यों इस कमीने लाला के लिए काम करता हैं। कलुवा जब चाहे लाला का काम तमाम करके उसकी सारी दौलत और ज़मीन पर कब्ज़ा कर सकता हैं पर कुछ तो होगा ऐसा जिसके कारण उसे लाला के यहाँ काम करना पड़ता हैं उसकी भी कोई मज़बूरी रही होगी जिसका फ़ायदा लाला उठा रहा हैं। लाला तो अपने बाप का भी बाप हैं किसी पर रेहम नही करता।


मेरे कितने भी हाथ पैर जोड़ने पर भी लाला नही माना इतने में कलुवा ने मुझे आके पकड़ लिया और मुझे उठा के एक हाथ से फेक दिया ऐसा लग रहा हो कि कलुवा के लिए मैं कोई कपड़े का गठ्ठर हूँ।मैं जमींन पे जा गिरा और बोलने लगा मुझे छोड़ दो पर मेरी किसी ने नही सुनी । कलुवा लगातार बेरहमी से मुझे से पिटे जा रहा था। मेरा एक हाथ भी टूट गया इतनी पिटाई के बाद लाला को चैन आया और उसने कलुवा को रुकने को कहा तब जा कर वो शांत हुआ। लाला मेरे पास आके कह के चला गया कि आगे से समय पे पैसे नही दिया रो यही हाल करूँगा। ये बोल के लाला और इसके पहलवान चले गये। ये सब तमाशा पूरा गाँव जमा हो कर देख रहा था, मुझे इसका जरा भी ध्यान नही था। ये तो अच्छा था मेरी घरवाली अपने मायके गयी हुई थी नही तो वो ये सब बर्दास्त नही कर पाती और ना ही मेरे बच्चे।
बच्चे स्कूल जाने लायक है पर मैं इस लायक नही की उन्हें स्कूल भी भेज सकूँ । मै तो उन्हें ठीक से खाना भी नही खिला पाता। घर के नाम पे एक टूटी फूटी सी मेरी छोटी सी झोपड़ी ही हैं इसमें भी अगर बारिश का दिन हो तो मेरी झोंपड़ी छन्नी बन जाती है जिससे पानी छन के आता हैं। कभी कभी मन में आता है ऐसी जिंदगी से मर जाना ही बेहतर हैं लेकिन अपने बच्चों का मुंह देखकर हर बार रुक जाता हूँ चाहे जैसे भी हो इन्हें पालने की कोशिश कर रहा हूँ भले ही हर बार मै नाक़ाम हो जाता हूँ। दिल से एक आवाज आती है जो बहुत संतोष भरा होता हैं “रुक जा ऐ मुशफिर अभी तेरा वक़्त नही आया है एक दिन जब तेरा वक़्त आएगा जब तुझे कोई रोकने वाला ना होगा चाहे लाख लगा दो पहरे ये पंछी अपने आप उड़ जाएगा बस इंतजार कर उस वक़्त जब तेरा दिन भी बदल जाएगा।
गांव वालों भी सिर्फ मेरी बेबशी का तमाशा देखते हैं कोई आगे आकर हाथ भी ना तो देता है। एक वक़्त था जब मै भी सपने में खोया रहता था अपनी ही मस्ती में मस्त रहने वाला इंसान अब कोलू का बैल बन के रह गया हैं जो दिन रात बस पिसता रहता हैं।

 
जिंदगी के अब मायने ही बदल गए पहले जीता था और अब बस जिन्दा हूँ अपने आखिरी अंजाम के लिएगरीब की जिंदगी तो बस दो वक़्त की रोटी कमाने में चली जाती हैं फिर भी कई रातो को भूखे पेट ही सोना पड़ता हैं बड़ी लगती हैं ये जिंदगी जब मौत का इंतजार हो और वो आप के साथ आँख मिचौली खेल रहा हो। अभी आधी उम्र भी नही हुई और चेहरा लटक गया गया है चमड़ी अभी से ढ़ीली महसूस होती है चेहरे पे झुर्रियो ने अपना कब्जा जमा लिया है 35 कि उम्र में ही 50 साल का लगता हूँ ये होती है गरीबी और लाचारी का असर, जो गरीब के चेहरे से उसकी लाचारी छुपाये नही छुपती, मेरे चेहरे की झुर्रिया चीख चीख के मेरी बेबशी को बया कर रही हो।
इस बार जो लाला से पैसे उधार लिए उसी पैसे से धान की बुआई तो कर दी पहली बारिश मेंअब आगे तो ऊपर वाला ही मुझे बचा सकता हैं इस बार अगर फसल अच्छी हुई तो लाला का कर्जा चूका कर भी थोरे पैसे बच जाएंगे अगर कुछ गड़बड़ हुई तो मैं पूरा बर्बाद हो जाऊँगा। पहले से करजे में हूँ और लाला व्याज के नाम पे घर का आधे से ज्यादा समान ले जा चूका हैं। बस ये फसल अच्छी हो जाये 5 सालो से इसी आस में जी रहा हूँ लेकिन हर बार कुछ ना कुछ हो ही जाता हैं जिससे मेरे सपने टूट जाते हैं।
रोज खेत में पानी पटा के वही सो जाता हूँ ताकि कोई आके मेरे खेत को बर्बाद ना कर दे मेरे पास जो है बस यही तो है। यही मेरे भविष्य को तय करने वाला है इसलिए इतनी इफजात करनी पर रही है। बस अब दस दिनों में कटाई शुरू करुगा और इसे बेच कर सबसे पहले लाला का कर्जा चुकाऊंगा उसके बाद ही अपने लिए और अपने परिवार के लिए कुछ करूँगा। यही सोच रहा था कि अचानक मौसम बदलने लगा आसमान में एकाएक काले घने बदल छा गए माहौल ऐसा लग रहा था मानो दिन की दोपहरिया में ही रात हो गायी हो साथ में तेज हवा भी चलने लगी मेरा मन जोर से घबराने लगा अगर ऐसी खड़ी फसल पे बारिश हुई तो मैं तो बर्बाद हो जाऊँगा। थोड़ी देर तेज हवाएं चलने के बाद हवा शांत हो गयी मुझे लगा अब कुछ नही होगा 15 से 20 मिनट तक एक पत्ता तक नही हिला। फिर अचानक वही हुआ जिसका मुझे डर था जोरदार बारिश शुरू हो गयी उसी के साथ मेरे आँखों से भी पानी बहने लगा। मै खेतो के बीच में खड़ा रहा और अपने आप को  बर्बाद होते देख रहा था इतने में मेरी घर वाली आती हैं और मुझे घर चलने को कहती हैं मैंने उसे मना कर दिया पर वो बार मेरा हाथ पकड़ के अपनी ओर खींचने की कोशिश करती पर मैं वही खड़ा का खड़ा रहा मनो मै कोई पत्थर की मुरत बन गया हूँ। बार बार मेरी बीबी के प्रयास करने पर वो भी तंग आके ये कह के चली गयी की “मारो तुम भी यही फसलो के साथ फसल तो गया अब तू भी यही मर“। बारिश का ये आलम था कि वो रुकने का नाम ही नही ले रही थी ।
ये बारिश भी लगता है मन बना के आया है कि ये इस बार मुझे भी साथ ले कर जायेगा। पूरा दिन और पूरी रात के बाद सुबह 5 बजे के आसपास जा के बारिश बंद हुईं, बारिश बंद होने के बाद पता चला की मेरा पूरा खेत और साथ के सभी खेत भी पानी से लबालब  भरे हुए थे मेरे साथ सभी की फसल बर्बाद हो चुकी थी।
ये देख कर मेरा अंदर मानो कुछ बचा ही ना हो मुझे बार बार बस एक ही ख्याल आ रहा था कि अब लाला के पैसे किसे चुकाऊंगा वो पिछली बार ही बोल के गया था कि इस बार अगर पैसे नही दिए तो मेरी झोपड़ी और मेरे बच्चे पर उसका कब्ज़ा हो जायेगा यही सब चल रहा था मेरे दिमाग में मेरे आँखों के आगे अंधेरा हो गया था ना मुझे कुछ दिख रहा था और ना ही कुछ समझ में आ रहा था कि किया करू बस खेतो को मैं घूरे जा रहा था और आगे बढ़ रहा था ।अचानक मैं सीधे जमीन पे जा गिरा और फिर कभी नही उठा एकाएक मुझे सब कुछ हल्का लगने लगा मेरा शरीर खेत के पानी में फसलो के बीच में तैर रहा था अब ना ही कोई चिंता थी ना ही किसी बात की फ़िक्र बस पानी के ऊपर तैरे जा रहा था।।

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